पीरियड्स लीव देने से सुप्रीम कोर्ट ने किया इंकार, लेकिन इन राज्यों में मिल रही छुट्टी; जानें कैसे उठी थी ये मांग?

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए देशभर में अनिवार्य पीरियड्स लीव की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इसे कानून बनाना महिलाओं के रोजगार और करियर पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

Post Published By: Sapna Srivastava
Updated : 13 March 2026, 2:15 PM IST
New Delhi: महिलाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान छुट्टी को लेकर देशभर में नीति बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, लेकिन शुक्रवार को अदालत ने इस मुद्दे पर सख्त टिप्पणी करते हुए याचिका पर सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पीरियड्स लीव को कानून के तहत अनिवार्य बना दिया गया तो इसका उल्टा असर पड़ सकता है और कई कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से ही बचने लगेंगी। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी याचिकाएं अनजाने में समाज में महिलाओं के बारे में बनी रूढ़िवादी सोच को और मजबूत कर सकती हैं।
अदालत ने सुनवाई से किया इनकार
शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मासिक धर्म की छुट्टी को लेकर देशव्यापी नीति बनाना सीधे कोर्ट का काम नहीं है और इस पर संबंधित विभाग तथा प्राधिकारी विचार कर सकते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार सभी हितधारकों से चर्चा कर इस विषय पर कोई नीति बनाने की संभावना की जांच कर सकती है।
“ऐसी याचिकाएं डर पैदा करती हैं”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं कई बार महिलाओं को हीन दिखाने और यह संदेश देने का काम करती हैं कि मासिक धर्म उनके साथ होने वाली कोई नकारात्मक चीज है। अदालत ने कहा कि मासिक धर्म से जुड़ा मुद्दा महिलाओं का सकारात्मक अधिकार जरूर है, लेकिन इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना कई नई समस्याएं भी पैदा कर सकता है।
महिलाओं के करियर पर पड़ सकता है असर
कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि अगर पीरियड्स लीव को अनिवार्य कर दिया गया तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह भी संभव है कि महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो जाएं और उनके करियर पर भी असर पड़े।
पहले से कुछ जगहों पर मिल रही सुविधा
इस मामले में याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने दलील दी कि देश के कुछ राज्यों और संस्थानों ने पहले से ही मासिक धर्म की छुट्टी देने की पहल की है। उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां कुछ स्कूलों में यह सुविधा दी जा रही है और कई निजी कंपनियां भी अपने स्तर पर कर्मचारियों को पीरियड्स लीव दे रही हैं। हालांकि, अदालत ने कहा कि अगर कोई संस्था स्वेच्छा से ऐसी छुट्टी देती है तो यह अच्छी बात है, लेकिन इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से नियोक्ताओं की सोच बदल सकती है और इसका नकारात्मक असर महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है।
रिसर्च में सामने आया दर्द का सच

वर्ष 2016 में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में प्रजनन स्वास्थ्य के प्रोफेसर जॉन गिलेबॉड ने बताया था कि कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान उतना ही दर्द महसूस होता है जितना हार्ट अटैक के समय होता है। वहीं, वर्ष 2012 में डिस्मेनोरिया पर हुए एक शोध में पाया गया कि करीब 20 प्रतिशत महिलाएं पीरियड्स के दौरान इतनी तकलीफ में होती हैं कि उनके लिए चलना-फिरना तक मुश्किल हो जाता है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार पीरियड्स के दर्द की वजह से काम से जुड़ी उत्पादकता में औसतन 33 प्रतिशत तक की कमी देखी गई, जो साल में लगभग 9 दिन के काम के बराबर मानी जाती है।

भारत में कहां-कहां मिलती है पीरियड लीव?

भारत में सबसे पहले बिहार ने 2 जनवरी 1992 से महिला कर्मचारियों को दो दिन की पीरियड लीव देने की शुरुआत की थी। इसके लिए महिला कर्मचारियों ने करीब 32 दिनों तक हड़ताल भी की थी। उस समय लालू प्रसाद यादव की सरकार ने यह व्यवस्था लागू की थी।

इसके बाद निजी क्षेत्र में भी कुछ कंपनियों ने पहल की। साल 2017 में मुंबई की कंपनी कल्चर मशीन ने एक दिन की पीरियड लीव देना शुरू किया। 2020 में फूड डिलीवरी कंपनी जोमैटो ने भी अपने कर्मचारियों के लिए पीरियड लीव का ऐलान किया। आज देश में करीब एक दर्जन कंपनियां जैसे बायजू, स्विगी, मातृभूमि, वेट एंड ड्राई और मैगज्टर अपने कर्मचारियों को यह सुविधा दे रही हैं। हाल ही में केरल सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग के तहत आने वाले विश्वविद्यालयों की छात्राओं को भी पीरियड लीव देने का फैसला लिया है।

विशेषज्ञों का क्या कहना है

महिला अधिकार कार्यकर्ता ऋचा सिंह के अनुसार, वैज्ञानिक नजरिए से महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान आराम की जरूरत होती है। इस समय पीसीओडी, एंडोमेट्रायोसिस या पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में महिलाओं को अपने शरीर को समय देने का अधिकार होना चाहिए।

मनोचिकित्सक मनीला बताती हैं कि पीरियड्स के दौरान कई महिलाएं मानसिक तनाव, मूड स्विंग और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं से गुजरती हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में 2021 में हुए एक सर्वे में पाया गया कि 70 प्रतिशत महिलाएं अपने मैनेजर से पीरियड्स के बारे में बात करने में असहज महसूस करती हैं।

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  • 13 March 2026, 2:15 PM IST