पूर्व विधायकों को आजीवन पेंशन क्यों? सुप्रीम कोर्ट के नोटिस से फिर गरमाया मामला

उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को मिलने वाली आजीवन पेंशन और दूसरी सुविधाओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा है।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 10 September 2026, 5:33 PM IST

New Delhi: उत्तर प्रदेश में पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का मामला अब एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और चार हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिया।

मामला गैर-सरकारी संगठन लोक प्रहरी की याचिका से जुड़ा है। संगठन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मई 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया था।

पेंशन के साथ इन सुविधाओं पर भी सवाल

याचिका में उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल से जुड़े 1980 के कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। इसी कानून के तहत पूर्व सदस्यों और कुछ मामलों में उनके जीवनसाथी या परिवार को पेंशन समेत दूसरी सुविधाएं मिलती हैं।

इन सुविधाओं में मुफ्त यात्रा और चिकित्सा सुविधा भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को मौजूदा सदस्यों के वेतन और भत्ते तय करने का अधिकार देता है। लेकिन पूर्व सदस्यों को आजीवन पेंशन देने की स्पष्ट व्यवस्था का इसमें उल्लेख नहीं है।

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याचिका में क्या कहा गया?

लोक प्रहरी की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि पूर्व जनप्रतिनिधियों को लंबे समय तक असीमित वित्तीय लाभ देना समानता और कानून के शासन के सिद्धांतों से जुड़े सवाल खड़े करता है।याचिकाकर्ता का कहना है कि जब किसी व्यक्ति का विधायक या विधान परिषद सदस्य के रूप में कार्यकाल खत्म हो जाता है, तो उसके बाद मिलने वाले आजीवन लाभों के लिए संवैधानिक आधार की जांच जरूरी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

मई 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस तरह की व्यवस्था को लेकर अलग रुख अपनाया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि पूर्व जनप्रतिनिधियों को वित्तीय लाभ या सामाजिक सुरक्षा देना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी कहा था कि संविधान में ऐसी व्यवस्था पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने यह तर्क भी माना था कि जनप्रतिनिधियों की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।

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अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है। अब यूपी सरकार को अपना पक्ष रखना होगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर आगे विस्तृत सुनवाई की जरूरत है या नहीं।

Location :  New Delhi

Published :  10 September 2026, 5:33 PM IST