SC आयोग के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब नहीं दे सकेगा ये आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (SC Commission) किसी कर्मचारी के बकाया वेतन का बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि आयोग की भूमिका केवल सलाह और सिफारिश तक सीमित है। इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर मुंबई पोर्ट अथॉरिटी की अपील स्वीकार की गई।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 29 July 2026, 9:25 AM IST

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति (एससी) आयोग की संवैधानिक शक्तियों को लेकर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि आयोग किसी कर्मचारी के बकाया वेतन के भुगतान का बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। अदालत के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 338, 338ए और 338बी के तहत गठित आयोगों की भूमिका सलाहकारी और सिफारिशी है, न कि न्यायिक।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण से जुड़ा है। अनुसूचित जाति की महिला कर्मचारी माधवी चंदोरकर ने आरोप लगाया था कि पदोन्नति मिलने के बाद उन्हें डिमोशन कर दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने 23 अक्टूबर 2024 को आदेश जारी करते हुए आरक्षण रोस्टर में सुधार, नियमानुसार पदोन्नति और 30 दिनों के भीतर बकाया वेतन का भुगतान करने के निर्देश दिए थे।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण ने आयोग के आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने आयोग के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण की अपील स्वीकार कर ली।

आयोग की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि आयोग को शिकायतों की जांच करने, दस्तावेज मांगने, साक्ष्य लेने और गवाहों से पूछताछ करने जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। हालांकि, इन शक्तियों का अर्थ यह नहीं है कि आयोग किसी अदालत की तरह अंतिम और बाध्यकारी आदेश जारी कर सकता है।

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बकाया वेतन का आदेश क्यों हुआ अमान्य?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान और कानून ने आयोग को केवल सिफारिश करने का अधिकार दिया है। इसलिए किसी कर्मचारी को बकाया वेतन देने जैसा बाध्यकारी आदेश आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा आदेश संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है और कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता।

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फैसले का क्या होगा असर?

इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों में जांच और सिफारिश तो कर सकता है, लेकिन वह किसी सरकारी विभाग या संस्था को वेतन भुगतान अथवा अन्य बाध्यकारी आदेश देने का अधिकार नहीं रखता। भविष्य में ऐसे मामलों में आयोग की भूमिका सलाह और अनुशंसा तक ही सीमित रहेगी।

Location :  New Delhi

Published :  29 July 2026, 9:21 AM IST