वफादार हैं तो टेस्ट से डर कैसा? जानिए क्या कहता है पैटरनिटी टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का नया कानूनी फरमान

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चों के पैटरनिटी टेस्ट पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति के प्रथम दृष्टया सबूत पेश करने पर कोर्ट DNA टेस्ट का आदेश दे सकता है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 20 August 2026, 8:44 AM IST

New Delhi: वैवाहिक जीवन के विवादों और बच्चों की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पति अपनी पत्नी पर अनैतिकता या बेवफाई का गंभीर आरोप लगाता है और बच्चे के बायोलॉजिकल पिता होने से इनकार करता है, तो ऐसी स्थिति में कोर्ट बच्चे का पैटरनिटी टेस्ट यानी DNA टेस्ट कराने का आदेश दे सकता है। यह फैसला तब आया जब एक महिला ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के उस निर्देश का विरोध किया था, जिसमें उसके बच्चे का DNA टेस्ट कराने को कहा गया था।

'यदि आप वफादार हैं, तो टेस्ट से ऐतराज क्यों?' - सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने सुनवाई के दौरान महिला पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए एक सीधा और तीखा सवाल उठाया। बेंच ने पूछा कि यदि महिला अपने रिश्ते के प्रति वफादार रही है और उसका आचरण सही है, तो उसे पैटरनिटी टेस्ट से आपत्ति क्यों होनी चाहिए? अदालत ने माना कि वैवाहिक कलह और गंभीर आरोपों के मामलों में सच्चाई तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य (Scientific Evidence) बेहद जरूरी हो जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि केवल इस पारंपरिक दलील के आधार पर DNA टेस्ट से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी को भी इसके लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

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क्या है पूरा मामला और कैसे सामने आया विवाद?

यह पूरा कानूनी विवाद पुणे से जुड़ा हुआ है। एक पति ने अपनी पत्नी के कथित अनैतिक चरित्र का हवाला देते हुए तलाक की अर्जी दाखिल की थी। पति का दावा था कि वह उस बच्चे का जैविक पिता नहीं है जो शादी के बंधन के दौरान पैदा हुआ था। अपने इस दावे को पुष्ट करने के लिए पति ने निजी तौर पर एक प्रतिष्ठित प्रयोगशाला से DNA टेस्ट करवाया था, जिसकी रिपोर्ट नेगेटिव आई थी। इस शुरुआती रिपोर्ट को आधार बनाते हुए पति ने फैमिली कोर्ट से कानूनी रूप से अधिकृत DNA टेस्ट कराने की मांग की थी, जिसे बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।

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न्याय की दिशा में वैज्ञानिक साक्ष्यों का बढ़ता महत्व

कानूनन शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाता है ताकि बच्चे के अधिकारों की रक्षा हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस नए दृष्टिकोण से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि पति प्रथम दृष्टया (Prima Facie) ऐसे ठोस सबूत या दस्तावेज पेश कर देता है जो उसके आरोपों को बल देते हैं, तो अदालत न्यायहित में सच्चाई का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट का रास्ता अपना सकती है। यह फैसला उन मामलों में एक नया मील का पत्थर साबित होगा जहां पति-पत्नी के बीच चरित्र हनन और संतान की पैटरनिटी को लेकर गंभीर कानूनी जंग छिड़ी रहती है।

Location :  New Delhi

Published :  20 August 2026, 8:44 AM IST