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कैंसर दवा पर 27 हजार MRP देख सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त (Img: AI Generated Image)
New Delhi: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए दवाओं का खर्च पहले ही बड़ी चिंता बना रहता है। ऐसे में अगर किसी दवा की कीमत में कई गुना का अंतर सामने आए तो सवाल उठना लाजिमी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा को लेकर ऐसा ही मामला सामने आया, जहां करीब 2,700 रुपये में मिलने वाली दवा पर 27,000 रुपये की MRP दर्ज थी।
इस बड़े अंतर को देखकर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत ने सवाल किया कि जब दवा खुदरा विक्रेता को करीब 2,700 रुपये में मिल रही है, तो मरीज से उसी दवा के लिए 27,000 रुपये क्यों लिए जाएं? कोर्ट ने मरीजों की आर्थिक मजबूरी का जिक्र करते हुए इस तरह की कीमत पर गंभीर चिंता जताई।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन मामलों में जरूरी दवाओं की कीमतों और दवा की सप्लाई चेन में मुनाफे से जुड़े सवाल उठाए गए थे। सुनवाई के दौरान जब 2,700 रुपये की लागत और 27,000 रुपये की MRP का मामला सामने आया तो अदालत ने पूछा कि मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जानी चाहिए। पीठ ने इस अंतर पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर इसे जबरन वसूली नहीं कहा जाए तो फिर और क्या कहा जाए। अदालत ने इस स्थिति को ‘दिनदहाड़े डकैती’ तक बताया।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि कैंसर के इलाज का खर्च उठाने के लिए कई परिवारों को अपनी संपत्ति और गहने तक बेचने पड़ते हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमत कई गुना बढ़ जाना मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ा बोझ बन जाता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में कार्रवाई करने वाले संबंधित अधिकारी आखिर चुप क्यों हैं। अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि अगर किसी जरूरी दवा की कीमत और MRP के बीच इतना बड़ा अंतर है तो इसकी निगरानी और जांच की जिम्मेदारी किसकी है।
मामले में यह बात भी सामने आई कि आयुष योजना के तहत इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमत का भुगतान आखिरकार सरकार से जुड़ता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी पैसा आखिरकार करदाताओं का ही पैसा है। ऐसे में अगर कोई दवा कम कीमत पर उपलब्ध है, लेकिन उसके लिए कई गुना ज्यादा रकम का भुगतान सरकारी व्यवस्था के जरिए किया जाता है, तो इस पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
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एक अन्य सुनवाई के दौरान कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का मुद्दा भी सामने आया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया गया कि कुछ राज्यों में अभी तक कैंसर को अधिसूचित बीमारी का दर्जा नहीं दिया गया है। इससे बीमारी की निगरानी, आंकड़ों के संकलन और उससे जुड़ी सरकारी व्यवस्था पर असर पड़ने की बात सामने आई।
Location : New Delhi
Published : 23 September 2026, 10:22 AM IST