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मद्रास हाई कोर्ट ने शख्स की मांग ठुकराई(AI Generated)
Chennai: पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं होने का दावा करते हुए बेटे का DNA टेस्ट कराने की मांग करने वाले एक शख्स को मद्रास हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट की मदुरै बेंच ने DNA टेस्ट कराने का आदेश देने से इनकार करते हुए पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। साथ ही, अदालत ने पत्नी को अपमानित करने और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करने पर पति पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
जस्टिस शमीम अहमद ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि बच्चे की पहचान और निजता के अधिकार को माता-पिता के बीच बेवफाई के आरोपों की जांच के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पति-पत्नी की शादी साल 2008 में हुई थी। दोनों का एक बेटा है। वैवाहिक विवाद बढ़ने के बाद पत्नी ने साल 2013 में पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया। इसके कई साल बाद, 2023 में पति ने अदालत में आवेदन देकर बच्चे का DNA टेस्ट कराने की मांग की।
पति का दावा था कि गर्भधारण से पहले की संबंधित अवधि और पूरी गर्भावस्था के दौरान उसके और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं बने थे। इसी आधार पर उसने बच्चे के जैविक पिता होने पर सवाल उठाए और DNA जांच के जरिए सच्चाई सामने लाने की मांग की।
हालांकि, मजिस्ट्रेट ने DNA टेस्ट कराने की मांग खारिज कर दी। इसके बाद पति ने इस फैसले को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि पति ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि संबंधित अवधि में उसका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था। अदालत ने यह भी गौर किया कि घरेलू हिंसा की कार्यवाही शुरू होने के कई साल बाद DNA टेस्ट की मांग की गई थी, लेकिन इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।
कोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे का DNA टेस्ट कराने का आदेश नियमित रूप से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए ठोस आधार होना जरूरी है। केवल संदेह या बेवफाई के आरोप के आधार पर बच्चे को वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में बच्चे के अधिकारों पर विशेष जोर दिया। कोर्ट के मुताबिक, किसी बच्चे को उसकी मां के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। पितृत्व से जुड़ा विवाद केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर बच्चे की पहचान, गरिमा और निजता पर भी पड़ सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन DNA टेस्ट कराने की मांग को स्वीकार करने से पहले कानूनी सिद्धांतों और बच्चे के हितों पर विचार करना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के महत्व को भी रेखांकित किया। इस प्रावधान के तहत वैध विवाह के दौरान या विवाह समाप्त होने के 280 दिनों के भीतर, मां के अविवाहित रहते हुए पैदा हुए बच्चे को वैध संतान मानने का कानूनी नियम लागू होता है, बशर्ते पति-पत्नी के बीच संबंधित अवधि में एक-दूसरे तक पहुंच न होने की बात साबित न हो।
इस कानूनी धारणा को चुनौती देने के लिए ठोस आधार जरूरी है। अदालत ने माना कि मौजूदा मामले में पति अपनी मांग के समर्थन में पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर पाया।
मद्रास हाई कोर्ट ने पति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अपमानित करने या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने पाया कि इस मामले में कार्यवाही का उद्देश्य पत्नी को बदनाम करना था।
इसी आधार पर पति पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। अदालत के फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि पितृत्व विवादों में DNA टेस्ट का आदेश देना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। ऐसे मामलों में बच्चे के हित, निजता और कानूनी अधिकारों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
Location : Chennai
Published : 28 October 2026, 12:29 PM IST
Topics : Chennai DNA test Madras High court Madurai Bench