K-Drama और K-Pop के जरिये कोरियन कल्चर युवाओं को परफेक्ट लव और परफेक्ट लाइफ की एक चमकदार तस्वीर दिखा रहा है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? आईये जानते हैं कि कोरियन फैंटेसी कैसे युवाओं की सोच, रिश्तों और मानसिक सेहत को प्रभावित कर रही है।

कोरियन कल्चर की ओर आकर्षित होता जेन-जी (Img: Google)
New Delhi: आज के डिजिटल जमाने में, कोरियन कल्चर ने भारतीय युवाओं के बीच तेजी से अपनी जगह बना ली है। K-Drama, K-Pop, कोरियन फैशन और ब्यूटी ट्रेंड्स अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहे, बल्कि वे अब कई युवाओं के विचारों, पसंद और सपनों को प्रभावित कर रहे हैं। सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली दुनिया, जो देखने में आकर्षक लगती है, उसमें एक अधूरा सच भी छिपा होता है।
कोरियन ड्रामा में दिखाई जाने वाली प्रेम कहानियां अविश्वसनीय रूप से प्योर, इमोशनल और आदर्शवादी लगती हैं। रिश्तों को सम्मान, समझ और त्याग पर जोर देते हुए दिखाया जाता है। पुरुष किरदारों को अक्सर संवेदनशील और "Green Flag" वाले गुणों वाला दिखाया जाता है, जबकि महिला किरदारों को स्वतंत्र और सशक्त दिखाया जाता है। यही वजह है कि आज के Gen-Z इस दुनिया से जल्दी जुड़ जाते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब एक स्क्रिप्टेड कल्पना है। असल जिंदगी के रिश्ते कहीं ज्यादा जटिल होते हैं, जिनमें असहमति, असुरक्षा और झगड़े शामिल होते हैं। जब युवा इन परफेक्ट ऑन-स्क्रीन रिश्तों की तुलना अपनी जिंदगी से करते हैं, तो उनमें असंतोष और निराशा पैदा होती है।
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के-पॉप सिर्फ संगीत नहीं है, यह एक पूरी इंडस्ट्री है जो आइडल्स को एक परफेक्ट इमेज में पेश करती है। उनकी जिंदगी, बातचीत और यहां तक कि भावनाओं को भी फैंस के साथ एक इमोशनल जुड़ाव बनाने के लिए सावधानी से मैनेज किया जाता है। कई युवा इस एकतरफा जुड़ाव को असलियत समझने लगते हैं, जिससे वे असल जिंदगी के रिश्तों से दूर हो सकते हैं।
कोरियन ब्यूटी ट्रेंड्स, जैसे "Glass Skin," पतला शरीर और बेदाग लुक-युवाओं, खासकर लड़कियों पर बहुत ज्यादा मानसिक दबाव डालते हैं। सोशल मीडिया फिल्टर और एडिटिंग इस भ्रम को और मजबूत करते हैं कि सुंदरता के यही एकमात्र स्टैंडर्ड हैं। नतीजतन, कई युवा अपनी शक्ल-सूरत को लेकर असंतुष्ट और असुरक्षित महसूस करते हैं।
रील्स, फैन एडिट और ऑनलाइन कम्युनिटी लगातार 24/7 युवाओं को यह कोरियन कल्पना दिखाते रहते हैं। धीरे-धीरे, स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली दुनिया असल जिंदगी से ज्यादा आकर्षक लगने लगती है। यहीं से समस्या शुरू होती है, जब वर्चुअल दुनिया असल जिंदगी की जगह लेने लगती है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, किसी भी ट्रेंड को बिना समझे और हद से ज्यादा फॉलो करना नुकसानदायक हो सकता है। अगर कोई युवा-
तो यह एक चेतावनी का संकेत है। हाल की घटनाओं ने यह सवाल भी उठाया है कि बिना रोक-टोक वाले डिजिटल कंटेंट और ऑनलाइन गेम्स टीनएजर्स की मेंटल हेल्थ पर कितना गहरा असर डाल सकते हैं।
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरियन कल्चर या किसी भी विदेशी ट्रेंड को पूरी तरह से रिजेक्ट करना समाधान नहीं है। जरूरत है बैलेंस और समझ की।
युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती। असल जिंदगी में कमियां होती हैं और यही उसे असली बनाती है। कोरियन कल्चर प्रेरणादायक हो सकता है, लेकिन इसे अपनी जिंदगी का ब्लूप्रिंट बनाना खतरनाक साबित हो सकता है।