
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स- Pinterest)
New Delhi: शादी के बाद पत्नी की इच्छा के खिलाफ बनाए गए यौन संबंधों को दुष्कर्म माना जाए या नहीं, इस बेहद संवेदनशील और लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि विवाह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता को खत्म नहीं करता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला सिर्फ सामाजिक सोच का नहीं बल्कि आपराधिक कानून और संविधान की कसौटी से जुड़ा हुआ है। अदालत को यह तय करना होगा कि मौजूदा वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद संविधान के अनुरूप है या इसमें बदलाव की जरूरत है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुनवाई करेगी जिसमें पत्नी के साथ कथित यौन हिंसा के मामले में पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि मामले में पत्नी को कथित तौर पर यौन गुलाम जैसी स्थिति में रखा गया था। उनका कहना है कि मौजूदा कानून की व्याख्या के आधार पर भी ऐसे मामलों में पति के खिलाफ कार्रवाई संभव हो सकती है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को मुख्य रूप से दो सवालों पर फैसला करना है। पहला सवाल यह है कि क्या मौजूदा वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की सीमित व्याख्या करके कुछ परिस्थितियों में पति के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि क्या यह अपवाद खुद संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा है कि पहले कर्नाटक मामले के जरिए कानून की व्याख्या के सवाल पर विचार किया जाएगा और इसके बाद संवैधानिक चुनौती पर सुनवाई होगी।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता को खत्म नहीं करती। अदालत ने माना कि विवाहित महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकार महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि मामला आपराधिक कानून से जुड़ा है, इसलिए हर पहलू को कानूनी नजरिए से देखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक दुष्कर्म का अपवाद पति को हर तरह की यौन हिंसा से सुरक्षा नहीं देता। अगर यौन हिंसा के कारण गंभीर चोट या मौत होती है तो अन्य आपराधिक कानून लागू हो सकते हैं।
सुनवाई के दौरान वकीलों ने 2012 के निर्भया कांड के बाद हुए कानूनी बदलावों का भी जिक्र किया। निर्भया मामले के बाद दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा को व्यापक बनाया गया था। पहले जहां इसे सीमित दायरे में देखा जाता था, वहीं बाद में अन्य प्रकार के यौन कृत्यों को भी इसमें शामिल किया गया। वकीलों ने दलील दी कि शादी के भीतर होने वाली यौन हिंसा के कई पहलुओं पर मौजूदा कानून में अभी भी स्पष्टता की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक कानून में बदलाव करते समय सावधानी जरूरी है क्योंकि इसका सीधा असर नागरिकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों पर पड़ता है।अदालत ने कहा कि किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करने के लिए यह देखना होगा कि क्या उसे बनाने का अधिकार विधायिका के पास था या वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। सुनवाई में यह भी सामने आया कि संसद ने 2023 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) बनाते समय इस मुद्दे पर विचार किया था। ऐसे में केंद्र सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
मैरिटल रेप विवाद की एक अहम कड़ी दिल्ली हाईकोर्ट का 11 मई 2022 का फैसला है। दो जजों की पीठ में इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आई थी। न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद को खत्म करने के पक्ष में फैसला दिया था, जबकि न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इसे बरकरार रखने की बात कही थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि मौजूदा वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद संविधान के अनुरूप है या इसमें बदलाव की जरूरत है। इस मामले की अंतिम सुनवाई करीब तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर देश में विवाह, सहमति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनों पर पड़ सकता है।
Location : New Delhi
Published : 9 September 2026, 8:53 PM IST