
सुप्रीम कोर्ट (Img: Google)
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट की बेंच उठने ही वाली थी कि अचानक स्क्रीन पर एक 12वीं के छात्र की तस्वीर उभरती है। छात्र हाथ जोड़कर खुद अपनी पैरवी करने की इजाजत मांगता है। अदालत ठहरती है, सुनती है और फिर जो फैसला आता है, उसे कानूनी हलकों में ऐतिहासिक बताया जा रहा है। महज 10 मिनट की बहस ने एक नीट क्वालिफाइड छात्र के लिए एमबीबीएस का रास्ता खोल दिया।
क्या है पूरा मामला
यह मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी नीट योग्य छात्र अथर्व चतुर्वेदी से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट की पीठ उठने वाली थी, तभी अथर्व ने स्वयं अपनी बात रखने की गुहार लगाई। पीठ की अगुवाई कर रहे सूर्य कांत ने उसे सुनने का अवसर दिया। करीब 10 मिनट तक चली बहस के बाद अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बड़ा आदेश पारित कर दिया।
अनुच्छेद 142 के तहत राहत
पीठ ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के तहत योग्य अभ्यर्थी को सत्र 2025-26 में उसकी रैंक के अनुसार एमबीबीएस में अस्थायी प्रवेश दिया जाए। यह अंतरिम राहत है, बशर्ते छात्र निर्धारित शुल्क और अन्य औपचारिकताएं पूरी करे।
यह आदेश चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जायमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पारित किया। अदालत ने माना कि अथर्व दो बार नीट परीक्षा पास कर चुका है, लेकिन नीतिगत अस्पष्टता के कारण उसे प्रवेश नहीं मिल सका।
आरक्षण नीति पर सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से दलील दी गई कि निजी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण नीति को लेकर विचार चल रहा है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि निजी कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं करते तो उन्हें बंद कर देना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि प्रशासनिक देरी के कारण किसी छात्र का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता।
राज्य का तर्क खारिज
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि छात्र काउंसलिंग की शर्तों से अवगत था, इसलिए अब उसे चुनौती नहीं दे सकता। लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। अथर्व ने पहले हाई कोर्ट में भी राजपत्र अधिसूचना को अनुच्छेद 14 और 15(6) का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी।
पिता ने बताई तैयारी की कहानी
अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी के मुताबिक, पिटीशन से लेकर डायग्राम और ग्राफ तक, सारी तैयारी बेटे ने खुद की। दिल्ली जाकर पैरवी करने में खर्च ज्यादा था, इसलिए उसने ऑनलाइन सुनवाई के जरिए खुद बहस करने का फैसला किया।
आगे क्या
फिलहाल अंतरिम आदेश से एमबीबीएस में प्रवेश का रास्ता खुल गया है। अंतिम फैसला आगे की सुनवाई पर निर्भर करेगा, लेकिन अदालत ने साफ कर दिया है कि एक योग्य छात्र का भविष्य प्रक्रियागत उलझनों में नहीं फंसना चाहिए।
Location : New Delhi
Published : 14 February 2026, 1:28 AM IST