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जमशेदपुर का कूड़ा बीनने वाला बच्चा ‘धूम’ सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। नशे और बीमारी से जूझ रहे पिंटू को NGO ने नई जिंदगी दी। अब वह इलाज के साथ भविष्य की नई राह तलाश रहा है।
कूड़ा बीनने से वायरल स्टार तक
New Delhi: झारखंड के जमशेदपुर में कूड़ा बीनकर जीवन गुजारने वाला एक अनाथ बच्चा इन दिनों पूरे सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वायरल वीडियो के जरिए पहचान बनाने वाला यह बच्चा लोगों के बीच ‘धूम’ के नाम से मशहूर हो गया है। उसकी अनोखी आवाज और अंदाज ने सोशल मीडिया यूजर्स को ऐसा आकर्षित किया कि हर हाथ में ‘धूम’ का गाना गूंजने लगा। लेकिन इस वायरल कहानी के पीछे संघर्ष, नशा, शोषण और अब उम्मीद की एक नई किरण भी छिपी है।
सोशल मीडिया पर जैसे ही ‘धूम’ के वीडियो वायरल हुए, यूट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स की भीड़ उसके आसपास जुटने लगी। हर कोई अपने-अपने तरीके से उसके वीडियो बनवाने और वायरल करने में लग गया। देखते ही देखते जमशेदपुर की सड़कों पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा इंटरनेट का हीरो बन गया। लोगों को उसकी आवाज में एक अलग ही कशिश नजर आई। यही वजह रही कि ‘धूम’ का गाना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से ट्रेंड करने लगा।
‘धूम’ के नाम से मशहूर इस बच्चे का असली नाम पिंटू है। पिंटू अनाथ है और लंबे समय से कूड़ा बीनने और छोटे-मोटे काम करके अपनी जिंदगी चला रहा था। सड़क ही उसका घर थी और नशा उसकी सबसे बड़ी कमजोरी। उसकी जिंदगी में शोषण आम बात थी। मजदूरी करने पर उसे पूरे पैसे नहीं मिलते थे। 500 रुपये की मेहनत के बदले सिर्फ 50 रुपये और थोड़ी शराब देकर उसे चुप करा दिया जाता था। फिर भी पिंटू खुद को खुश मान लेता था।
जैसे-जैसे पिंटू की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे उसका खतरा भी बढ़ने लगा। लोग उसे सिर्फ कंटेंट के तौर पर देखने लगे। कोई 50-100 रुपये थमा देता, कोई वीडियो बनाकर चला जाता। लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा था कि नशे की हालत में जी रहा यह बच्चा धीरे-धीरे अपनी जिंदगी खो सकता है।
इसी बीच एक गैर सरकारी संस्था (NGO) की नजर ‘धूम’ पर पड़ी। सोशल मीडिया के जरिए उसकी हालत देखकर संस्था के लोगों ने फैसला किया कि उसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। NGO संचालक प्रतीक कुमार के अनुसार, “अगर हम उसे समय पर यहां नहीं लाते तो वह पूरी तरह नशे की गिरफ्त में चला जाता।”
NGO के अनुसार पिंटू सिर्फ नशे का शिकार नहीं था, बल्कि उसे जॉन्डिस और लीवर इंफेक्शन जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी थीं। फिलहाल उसका इलाज चल रहा है और वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा है। शुरुआत में पिंटू बिना नशे के किसी से बात करने या सामान्य व्यवहार करने में भी असहज महसूस करता था, लेकिन अब उसकी स्थिति में सुधार दिख रहा है।
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NGO में रहने को लेकर पिंटू (धूम) ने कहा कि यहां अच्छा लग रहा है। अच्छा खाना मिलता है, दूध, रोटी, चावल, चोखा, पावरोटी। जूस भी पी लेते हैं। दोस्तों के बारे में पूछने पर उसने कहा कि पुराने दोस्तों से अब दूर हो गया हूं। कचरा बिनने वाले दोस्त नशा कराते थे। उनके साथ रहने से फिर नशे में जाने का डर है।
NGO संचालक प्रतीक कुमार ने कहा कि हमारा पास्ट हमें परिभाषित नहीं करता। आगे हम क्या करते हैं, वही हमारी पहचान बनाता है। अगर समाज सिर्फ उसके अतीत को देखेगा तो वह हमेशा नशेड़ी या चोर कहलाएगा। उन्होंने कहा कि पिंटू के अंदर टैलेंट है और सही मार्गदर्शन मिले तो वह अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकता है।