शख्स ने बंजर ढलानों पर बिखेरी फूलों की खुशबू, इस दोहरे मिथक को भी तोड़ा

धारी विकासखंड के युवक ने सदियों के इस दोहरे मिथक को तोड़ दिया। उन्होंने बंजर भूमि पर फूल और फलों की उन्नत खेती शुरू कर अपने जीवन की दिशा बदल दी। चालीस नाली में फैली खेती आज गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

Post Published By: Jay Chauhan
Updated : 4 April 2026, 3:06 AM IST

Nainital: जिले के धारी विकासखंड के पहाड़पानी गांव की ढलानों पर कभी सिर्फ सूखी झाड़ियां दिखाई देती थीं, लेकिन इन ढलानों ने कुछ ही सालों में रंग बदल दिए। आज यहां हवा में फूलों की महक घुली है और इस बदली खुशबू के पीछे खड़ा है गांव का एक शांत-स्वभाव, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला शख्स कमलेश महतोलिया।

कमलेश ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। वह गुजरात में नौकरी करते थे लेकिन कमलेश का मन वहां कभी स्थिर नहीं रहा। हर शाम जब वह शहर की भीड़ में खोए खड़े होते, उनकी आंखों में गांव की पहाड़ियां, घर की रसोई की खुशबू और माता-पिता की झुर्रियों वाला स्नेह तैर जाता। आखिरकार एक दिन उन्होंने तय किया कि वहीं जाएंगे जहां उनका दिल बसता है।

गांव लौटना आसान था, लेकिन नई शुरुआत आसान नहीं। खेत तो थे, पर जमीन लगभग निर्जीव। सोच नई थी, लेकिन साधन कम।

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कमलेश ने हाथों की मेहनत और जमीन के विश्वास पर भरोसा किया। उन्होंने सूखी पड़ी जमीन को संभाला, उसे फिर से जीवित किया और फूलों की उन्नत खेती शुरू कर दी। दस नाली से उठे इस छोटे-से प्रयास ने धीरे-धीरे चालीस नाली में फैलकर एक खूबसूरत घाटी का रूप ले लिया। उनके खेतों में अब लिलियम के साथ-साथ ओरिएंटल और एशियाटिक नस्लों के फूल खिलते हैं। सुबह का सूरज जब खेतों पर पड़ता है, तो हर पंखुड़ी में उम्मीद की चमक दिखाई देती है।

फूलों के बाद उन्होंने फल भी उगाए सेब, कीवी, स्ट्रॉबेरी। तीस नाली भूमि पर फैली यह खेती न सिर्फ उनके परिवार के लिए सहारा बनी, बल्कि गांव में नए अवसरों का कारण भी। उनके खेतों में काम करने आने वाले आठ दस स्थानीय लोगों की ज़िंदगी भी आज स्थिर है। कमलेश कहते हैं कि रोज़गार देना उनके लिए कमाई से बड़ा संतोष देता है।

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मेहनत ने  दिखाया रंग

मेहनत ने रंग दिखाया और अब कमलेश हर महीने करीब दो लाख रुपये की शुद्ध आमदनी हासिल कर रहे हैं। लेकिन वह अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ खुद को नहीं देते। वह अक्सर कहते हैं अगर सरकार का सहारा और सही दिशा न मिलती, तो आज यह सफर इतनी दूर तक नहीं आता।

धारी की पहाड़ियों पर खिले ये फूल सिर्फ एक किसान की मेहनत का फल नहीं हैं। ये इस बात की गवाही भी हैं कि जब युवा अपने गांवों की ओर लौटते हैं। और कुछ करने का जज्बा है  तो बंजर जमीन भी सोना उगलने लगती है।

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कमलेश महतोलिया ने अपनी इच्छाशक्ति और कठिन मेहनत से इस दौहरे मिथक को भी तोड़ दिया जिसमें पहाड़ों की जवानी कभी पहाड़ों के काम नहीं आयी और दूसरा पहाड़ों की बंजर धरती पर खेती करना उतना ही मुश्किल है जितना रोजी रोटी के लिए मैदान के रुख के बगैर कल्पना करना।

Location :  Nainital

Published :  4 April 2026, 3:06 AM IST

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