DN Exclusive: मेरठ के SSP रहे अविनाश पांडेय का अब क्या हुआ? लखनऊ ट्रांसफर होने के बाद IPS साहब परेशान! पढ़ें पूरा मामला
मेरठ के तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय के ट्रांसफर के बाद दलित छात्रा हत्याकांड का मामला फिर गरमा गया है। सांसद चंद्रशेखर आजाद ने पुलिस हिरासत में कथित बर्बरता के आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।
मोहित जाटव-दिग्विजय भाटी और आईपीएस अविनाश पांडेय (IMG: Dynamite News)
Meerut/Lucknow News: मेरठ के एसएसपी रहे अविनाश पांडेय का ट्रांसफर हो गया। उनका ट्रांसफर 20 अगस्त की रात को हुआ था। उनके ट्रांसफर होने के बाद ही उनकी ज़िंदगी में जैसे अब परेशानियों का पहाड़ बनने वाला है। दरअसल, बीते कुछ दिनों पहले मेरठ में दलित छात्रा हत्याकांड हुआ था। उस मामले में मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडेय ने छात्रा के पक्ष में प्रदर्शन करने वालों पर थप्पड़बाजी की थी। उनका वीडियो वायरल हुआ तो मेरठ से इस कांड की आग लखनऊ तक पहुंची। खैर, शासन ने निष्पक्ष जांच के आदेश दिए। अब अविनाश पांडेय का ट्रांसफर लखनऊ हो गया। उनको डीजीपी दफ्तर से अटैच कर दिया है , लेकिन उनके ट्रांसफर के साथ मेरठ का मुद्दा लखनऊ तक पहुंच गया है।
कांड में अब फिर कूदे चंद्रशेखर आजाद
आईपीएस अविनाश पांडेय के लखनऊ ट्रांसफर के बाद मेरठ दलित छात्रा हत्याकांड को उठाने वाले मुख्य नेता और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने ट्वीट करते हुए लिखा, "मेरठ में मोहित जाटव और दिग्विजय भाटी के साथ पुलिस हिरासत में हुई बर्बरता कानून-व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल करने वाली हैं। पीड़ितों का आरोप है कि तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय ने दोनों को अपने कार्यालय बुलाकर गालियां दी और चैंबर बंदकर उनके साथ मारपीट की थी। इसके बाद SOG के हवाले कर उन्हें पैर बांधकर उल्टा लटकाने और फट्टों-लाठियों से बेरहमी से पीटने का भी आरोप है।"
योगी आदित्यनाथ से चंद्रशेखर आजाद ने क्या कहा?
चंद्रशेखर आजाद ने आगे कहा, "मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, यह पुलिसिंग नहीं, बल्कि वर्दी की ताकत का खुला दुरुपयोग और हिरासत में यातना है। किसी भी अधिकारी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार तत्काल CCTV फुटेज सुरक्षित कराए, पीड़ितों का स्वतंत्र मेडिकल परीक्षण कराए और आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई हो। वर्दी कानून से बड़ी नहीं है और आम नागरिकों की आवाज को पुलिसिया ताकत के बल पर दबाना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।"