करोड़ों खर्च, फिर भी अंधेरे में 22 गांव: गोरखपुर के चिल्लूपार विद्युत उपकेंद्र की गलत प्लानिंग से आफत में उपभोक्ता

गोरखपुर के चिल्लूपार में करोड़ों की लागत से बना विद्युत उपकेंद्र भ्रष्टाचार और गलत नियोजन का शिकार बना हुआ है। घाघरा नदी के डूब क्षेत्र में 40 किमी दूर बने इस उपकेंद्र की 33 केवी लाइन में तकनीकी खामियों के कारण बार-बार ब्रेकडाउन होता है, जिससे 22 गांवों के उपभोक्ता लगातार बिजली संकट झेलने को मजबूर हैं।

Post Published By: Priyam Kashyap
Updated : 1 November 2026, 3:01 PM IST

Gorakhpur: बिजली आपूर्ति की समस्या दूर करने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से बनाया गया चिल्लूपार (रतनपुर) विद्युत उपकेंद्र अब खुद ही उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उपकेंद्र का निर्माण मूल क्षेत्र चिल्लूपार से करीब 40 किलोमीटर दूर घाघरा नदी के बाढ़ प्रभावित इलाके में कराया गया। लंबी विद्युत लाइन और वैकल्पिक आपूर्ति की व्यवस्था हटने के बाद क्षेत्र के करीब 22 गांवों के हजारों उपभोक्ताओं को बिजली कटौती की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

चिल्लूपार से 40 किलोमीटर दूर बनाया गया उपकेंद्र

स्थानीय लोगों के मुताबिक, सपा शासनकाल में करोड़ों रुपये की लागत से चिल्लूपार विद्युत उपकेंद्र का निर्माण विकासखंड बेलघाट की ग्राम सभा रतनपुर में कराया गया था। यह स्थान घाघरा नदी के बाढ़ प्रभावित मैरूंड क्षेत्र में पड़ता है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उपकेंद्र के स्थान चयन और विद्युत लाइन बिछाने के दौरान तकनीकी मानकों का ध्यान नहीं रखा गया।

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बड़हलगंज से उपकेंद्र तक करीब 40 किलोमीटर लंबी 33 हजार वोल्ट की लाइन बिछाई गई है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस लाइन में एक पोल से दूसरे पोल के बीच करीब 80 से 90 मीटर की दूरी है, जबकि सामान्य तौर पर यह दूरी 50 से 60 मीटर बताई जाती है। उनका कहना है कि लंबी लाइन और पोलों के बीच अधिक दूरी के कारण तेज हवा या खराब मौसम में बार-बार ब्रेकडाउन की समस्या आती है।

सात साल तक शोपीस बना रहा उपकेंद्र

जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2014 में निर्माण पूरा होने के बाद उपकेंद्र को संचालन के लिए तैयार माना गया था, लेकिन लखनऊ से आई तकनीकी टीम ने इसे संचालन योग्य नहीं पाया। इसके बाद करोड़ों रुपये की लागत से बना उपकेंद्र करीब सात वर्षों तक लगभग निष्क्रिय रहा। इस दौरान यहां से केवल रतनपुर गांव को कभी-कभार बिजली आपूर्ति की जाती थी।

2022 में शुरू हुई आपूर्ति, बाद में हटाई गई वैकल्पिक व्यवस्था

वर्ष 2022 में धुरियापार उपकेंद्र के निरीक्षण के दौरान तत्कालीन अधीक्षण अभियंता रमेश श्रीवास्तव ने अहिरौली फीडर पर बढ़ते लोड और बिजली आपूर्ति की समस्या को देखते हुए चिल्लूपार उपकेंद्र को चालू कराने की पहल की थी। इसके बाद धुरियापार उपकेंद्र से जुड़े 10 से 12 गांवों के उपभोक्ताओं को चिल्लूपार उपकेंद्र से जोड़कर बिजली आपूर्ति शुरू कराई गई।

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उस समय व्यवस्था बनाई गई थी कि 33 हजार वोल्ट की लाइन में खराबी आने पर धुरियापार से तत्काल टैपिंग करके बिजली आपूर्ति बहाल की जाएगी। बाद में करीब 10 और गांवों को चिल्लूपार उपकेंद्र से जोड़ दिया गया, लेकिन उपभोक्ताओं के मुताबिक धुरियापार से तत्काल वैकल्पिक आपूर्ति की व्यवस्था हटा दी गई।

खराबी आने पर 8 से 12 घंटे तक इंतजार

स्थानीय उपभोक्ताओं का कहना है कि अब 33 हजार वोल्ट की लाइन में खराबी आने पर बिजली बहाल होने में 8 से 12 घंटे तक लग जाते हैं। लंबी लाइन में खराबी का पता लगाने और मरम्मत करने में समय लगता है। उनका आरोप है कि धुरियापार से वैकल्पिक आपूर्ति तभी शुरू की जाती है, जब लंबी लाइन की मरम्मत तत्काल संभव नहीं हो पाती।

सुरक्षित स्थान पर उपकेंद्र बनाने की मांग

क्षेत्र के उपभोक्ताओं ने मांग की है कि चिल्लूपार उपकेंद्र को घाघरा नदी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से हटाकर किसी सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया जाए। इसके साथ ही इसे डेहरी भार से आने वाली नजदीकी 33 हजार वोल्ट की लाइन से जोड़ने की मांग भी उठाई गई है। उपभोक्ताओं का कहना है कि जब तक उपकेंद्र के स्थान और बिजली आपूर्ति की व्यवस्था में स्थायी बदलाव नहीं किया जाता, तब तक करीब 22 गांवों के हजारों लोगों को बिजली संकट का सामना करना पड़ सकता है।

Location :  Gorakhpur

Published :  1 November 2026, 2:59 PM IST