कौन हैं जज, जिन्होंने राहुल गांधी को अमित शाह मानहानि केस में किया बरी? जानिए पूरी कहानी

कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अमित शाह से जुड़े मानहानि मामले में राहत मिलने के बाद सुल्तानपुर की अदालत और फैसला सुनाने वाले न्यायिक अधिकारी शुभम वर्मा चर्चा में हैं।

Updated : 26 October 2026, 2:53 PM IST
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सुल्तानपुर: कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अमित शाह से जुड़े मानहानि मामले में राहत मिलने के बाद सुल्तानपुर की अदालत और फैसला सुनाने वाले न्यायिक अधिकारी शुभम वर्मा चर्चा में हैं। 26 अक्टूबर 2026 को विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने राहुल गांधी को 2018 में की गई कथित टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में बरी कर दिया। इस फैसले ने आठ साल पुराने मामले को एक नया मोड़ दिया है। लेकिन फैसला सुनाने वाले जज शुभम वर्मा कौन हैं, उनकी न्यायिक सेवा का सफर कैसा रहा है और आखिर यह मामला अदालत तक कैसे पहुंचा? आइए जानते हैं पूरी कहानी।

कौन हैं जज शुभम वर्मा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शुभम वर्मा उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा के अधिकारी हैं। वह सुल्तानपुर में अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात हैं। उनका गृह जिला देवरिया है।

शुभम वर्मा ने 27 फरवरी 2015 को न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में न्यायिक जिम्मेदारियां संभालीं। उनकी शुरुआती तैनाती बस्ती में रही, जहां उन्होंने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में काम किया। इसके बाद उनकी तैनाती मऊ, गाजियाबाद और सुल्तानपुर में हुई। जनवरी 2019 में उन्हें सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर पदोन्नति मिली।

उनकी शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने 2007 में बीए, 2010 में एलएलबी और 2021 में एलएलएम की पढ़ाई पूरी की। न्यायिक सेवा में आने के बाद भी उनकी शैक्षणिक यात्रा जारी रही। उनकी नियुक्ति, पदोन्नति और तैनाती से जुड़ी जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट के आधिकारिक न्यायिक अधिकारी प्रोफाइल में दर्ज है।

कैसे शुरू हुआ राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मामला?

यह मामला वर्ष 2018 का है, जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने बेंगलुरु में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को लेकर टिप्पणी की थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी ने शाह को हत्या के मामले में आरोपी बताते हुए ऐसी टिप्पणी की, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

इस मामले में स्थानीय भाजपा नेता विजय मिश्रा ने 4 अगस्त 2018 को आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई। शिकायत भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत की गई थी। धारा 499 मानहानि के अपराध से संबंधित थी, जबकि धारा 500 में इसके लिए सजा का प्रावधान था।

यह टिप्पणी सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले के संदर्भ में की गई थी। इस मामले में मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने वर्ष 2014 में अमित शाह को आरोपों से मुक्त कर दिया था। शिकायतकर्ता ने राहुल गांधी की टिप्पणी को आपत्तिजनक और मानहानिकारक बताया, जबकि राहुल गांधी ने आरोपों का विरोध किया और टिप्पणी को संदर्भ से अलग करके पेश किए जाने की दलील दी।

आठ साल तक चली कानूनी प्रक्रिया

शिकायत दर्ज होने के बाद मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा। 27 नवंबर 2023 को राहुल गांधी को मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया गया था। इसके बाद फरवरी 2024 में वह सुल्तानपुर की अदालत में पेश हुए और उन्हें जमानत मिली।

सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से राहुल गांधी की आवाज के नमूने का मिलान कराने की मांग भी की गई थी। इस मांग को ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देने की कानूनी कोशिशें भी हुईं, लेकिन संबंधित अदालतों में शिकायतकर्ता पक्ष को राहत नहीं मिली।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसले के लिए 26 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की। उस दिन राहुल गांधी अदालत में मौजूद रहे और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शुभम वर्मा ने फैसला सुनाया।

अदालत ने क्या फैसला दिया?

26 अक्टूबर को सामने आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने राहुल गांधी को बरी करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी मानहानिकारक नहीं थी। रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि शिकायतकर्ता के मामले में कानूनी रूप से पीड़ित पक्ष होने के सवाल पर अदालत ने विचार किया। हालांकि, फैसले के विस्तृत कानूनी तर्कों और प्रत्येक मुद्दे पर अदालत की टिप्पणी को पूरी तरह समझने के लिए न्यायालय का लिखित आदेश देखना जरूरी है।

यह फैसला केवल इसी आपराधिक मानहानि शिकायत से संबंधित है। इसे राहुल गांधी के खिलाफ किसी दूसरे मामले के नतीजे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी तरह, किसी न्यायिक अधिकारी की व्यक्तिगत या राजनीतिक विचारधारा के बारे में केवल फैसले के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

क्यों चर्चा में हैं शुभम वर्मा?

शुभम वर्मा की चर्चा की प्रमुख वजह एक ऐसे मामले में फैसला सुनाना है, जिसमें राष्ट्रीय राजनीति के दो प्रमुख नेताओं से जुड़ा विवाद और करीब आठ साल की कानूनी प्रक्रिया शामिल रही। लेकिन उनकी पेशेवर पहचान केवल इस एक फैसले तक सीमित नहीं है। वह 2015 से न्यायिक सेवा में हैं और बस्ती, मऊ, गाजियाबाद तथा सुल्तानपुर में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।

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इस मामले की अहमियत यह भी है कि यह सार्वजनिक बयानों, राजनीतिक आलोचना और आपराधिक मानहानि के बीच कानूनी सीमा को लेकर सवाल उठाता है। अदालत का फैसला किसी भी मामले में आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होता है। इसलिए इस प्रकरण को समझने के लिए राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ अदालत के लिखित आदेश और कानूनी आधारों को देखना भी जरूरी है।

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Location :  सुल्तानपुर

Published :  26 October 2026, 2:53 PM IST

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