कभी दिल्ली सल्तनत की राजधानी था फर्रुखाबाद का यह छोटा सा कस्बा, जानिए इसका 2500 साल पुराना इतिहास

गंगा के पावन तट पर बसा शमसाबाद आज भले ही एक शांत कस्बा नजर आता हो, लेकिन इसकी मिट्टी में सदियों पुराना गौरवशाली इतिहास दफन है। प्राचीन सभ्यताओं के अवशेषों से लेकर सल्तनत और मुगल काल तक की कई ऐतिहासिक परतों को खुद में समेटे यह शहर आज भी अपनी अनसुनी दास्तान बयान करता है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 3 August 2026, 12:14 PM IST

Farrukhabad: गंगा के पावन तट पर बसा फर्रुखाबाद का ऐतिहासिक नगर शमसाबाद आज भले ही एक शांत कस्बा दिखाई देता हो, लेकिन इसका अतीत अत्यंत गौरवशाली और रहस्यमयी रहा है। कभी यह नगर दिल्ली सल्तनत की अस्थायी राजधानी भी रहा था।

2,500 साल पुरानी सभ्यता के सबूत

शमसाबाद और इसके आसपास फैले प्राचीन टीले, खंडहर, मिट्टी के बर्तनों के अवशेष तथा यहां से प्राप्त प्राचीन सिक्के इसकी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत की गवाही देते हैं। पुरातत्वविदों को यहां उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भांड (Northern Black Polished Ware) प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में लगभग 2,500 वर्ष पुरानी सभ्यता के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं।

राजा खोर और चौमुखी शिव मंदिर से जुड़ी आस्था

मध्यकालीन ग्रंथ 'तारीख-ए-फिरोजशाही' में इस स्थान का उल्लेख 'खोर नगर' के नाम से मिलता है। 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच यहां पहले प्रतिहार वंश और बाद में कन्नौज के गहड़वाल राजवंश का शासन रहा।

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कहा जाता है कि राजा खोर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके समय में निर्मित चौमुखी शिव मंदिर आज भी इस आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। माना जाता है कि कन्नौज के हर्षकाल में बने गौरीशंकर मंदिर के बाद यह क्षेत्र का लगभग 800 वर्ष पुराना महत्वपूर्ण शिव मंदिर है।

इसे शमशाबाद नाम कैसे मिला?

राजा खोर ने यहां एक ऊंचे टीले पर विशाल किले का निर्माण कराया था। समय के साथ उसी स्थान पर आज की जामा मस्जिद स्थापित हुई। बाद में दिल्ली सल्तनत के शासक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के सम्मान में खोर नगर का नाम बदलकर 'शमसाबाद' रखा गया।

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इतिहास बताता है कि जब दिल्ली में जल संकट उत्पन्न हुआ, तब कुछ समय के लिए शमसाबाद को दिल्ली सल्तनत की राजधानी बनाया गया। यह नगर सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। लोधी शासकों और जौनपुर के शर्की सुल्तानों के बीच हुए अनेक युद्धों का यह क्षेत्र साक्षी रहा। इन संघर्षों में शहीद हुए सैनिकों को यहीं दफनाया गया, जिसके कारण यह स्थान 'गंज-ए-शहीदां' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

राजधानी और सामरिक महत्व के कारण खिज्र खान तथा सिकंदर लोदी भी शमसाबाद आए। जिस स्थान पर सिकंदर लोदी ने अपना सैन्य शिविर स्थापित किया था, वह आगे चलकर सिकंदरपुर महमूद के नाम से जाना जाने लगा।

कई लड़ाइयों का गवाह रहा एक ऐतिहासिक शहर

सन् 1528 ईस्वी में मुगल सम्राट बाबर ने विक्रमजीत सिसोदिया को शमसाबाद का गवर्नर नियुक्त किया। बाद में हुमायूं, शेरशाह सूरी से पराजित होने के पश्चात, शमसाबाद के मार्ग से ही दिल्ली की ओर गया।

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सम्राट अकबर के शासनकाल में शमसाबाद को कन्नौज सरकार का एक महत्वपूर्ण परगना बनाया गया। उस समय मिर्जा ताहिर और राय दामोदर दास यहां के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी थे। आज भी शमसाबाद के निकट स्थित अकबरपुर दामोदर गांव उनके ऐतिहासिक योगदान की याद दिलाता है।

इतिहास को संजोने की जरूरत

शमसाबाद का इतिहास केवल इमारतों और खंडहरों में ही नहीं, बल्कि इसकी मिट्टी, संस्कृति और लोकस्मृतियों में भी जीवित है। यह नगर उत्तर भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसे संरक्षित और शोध के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी साझा जिम्मेदारी है।

Location :  Farrukhabad

Published :  3 August 2026, 12:14 PM IST