UP में ‘दबदबे’ का खेल खत्म? हथियारों के गलत इस्तेमाल पर हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हथियार लाइसेंस व्यवस्था पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि आत्मरक्षा के नाम पर खुलेआम बंदूकें रखना समाज में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर रहा है। कोर्ट ने सरकार से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को हथियार लाइसेंस देने की नीति पर दोबारा विचार करने को कहा है। साथ ही सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को आर्म्स एक्ट के नियमों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 22 May 2026, 2:05 PM IST

Prayagraj: उत्तर प्रदेश में हथियारों के लाइसेंस को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था और बाहुबल की राजनीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर खुलेआम बंदूकें रखना अब सुरक्षा का माध्यम कम और लोगों को डराने-धमकाने का जरिया ज्यादा बनता जा रहा है। अदालत ने माना कि समाज में जब हथियारों का प्रदर्शन ताकत और रौब दिखाने के लिए होने लगे, तो वहां आम नागरिक खुद को सुरक्षित नहीं बल्कि असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को हथियार लाइसेंस देने की नीति पर नए सिरे से विचार करे। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में हथियार ऐसे औजार बनते जा रहे हैं जिनका इस्तेमाल ताकत दिखाने, दबदबा कायम करने और डर का माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है। इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है और लोगों के भीतर भय पैदा होता है।

हथियार नहीं, कानून से बनता है सुरक्षित समाज

कोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि आत्मरक्षा का असली मतलब अपनी और दूसरों की जान बचाना है, न कि बंदूक के दम पर समाज में दबदबा बनाना। अदालत ने कहा कि जिस समाज में हथियारों का प्रदर्शन आम हो जाए, वहां कानून का सम्मान धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। लोग सुरक्षा के लिए प्रशासन और कानून पर भरोसा करने के बजाय बाहुबलियों से डरने लगते हैं।

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अपराधियों को लाइसेंस देने पर सरकार से जवाब

इस मामले में जस्टिस विनोद दिवाकर की अदालत पहले भी सख्त रुख अपना चुकी है। इससे पहले कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि हथियार लाइसेंस जारी करने और उनके नवीनीकरण में आर्म्स एक्ट और उससे जुड़े नियमों का पूरी सख्ती से पालन किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जिन लोगों का आपराधिक इतिहास है, उन्हें लाइसेंस देने की नीति की समीक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने सरकार से ऐसे लोगों का पूरा ब्योरा भी मांगा था जिनके पास हथियार लाइसेंस मौजूद हैं।

यूपी में 10 लाख से ज्यादा हथियार लाइसेंस

सरकार की ओर से दाखिल आंकड़ों ने भी कई बड़े सवाल खड़े कर दिए। हलफनामे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 10,08,953 हथियार लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं। वहीं अलग-अलग श्रेणियों के 23,407 आवेदन अभी भी लंबित हैं। इसके अलावा जिलाधिकारियों के आदेशों के खिलाफ 1,738 अपीलें आयुक्तों के पास लंबित बताई गई हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा यह रहा कि राज्य में 20,960 परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक से ज्यादा हथियार लाइसेंस मौजूद हैं। वहीं 6,062 ऐसे लोगों को भी हथियार लाइसेंस दिए गए हैं जिनका आपराधिक इतिहास रहा है।

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अगली सुनवाई 26 मई को

हाईकोर्ट ने मामले में अनुपालन रिपोर्ट तलब करते हुए अगली सुनवाई 26 मई तय की है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार हथियार लाइसेंस नीति में क्या बदलाव करती है और कोर्ट के निर्देशों का पालन किस तरह होता है। फिलहाल अदालत की इस सख्त टिप्पणी ने राज्य में हथियार संस्कृति, बाहुबल और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यही है कि क्या बंदूकें सच में सुरक्षा देती हैं या फिर समाज में डर और असुरक्षा को और बढ़ा रही हैं।

Location :  Prayagaraj

Published :  22 May 2026, 2:05 PM IST