Allahabad High Court: क्या पिता किसी को भी दे सकता है अपने बच्चे? इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले ने बदली कस्टडी की परिभाषा

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चों की कस्टडी और नैसर्गिक संरक्षक के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। कोर्ट ने एकलपीठ के पुराने आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कस्टडी स्थानांतरण की वैधता पर स्पष्ट टिप्पणी की है।

Updated : 30 April 2026, 6:36 AM IST

Prayagraj:  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों के संरक्षण और कस्टडी को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि एक पिता, भले ही वह नैसर्गिक संरक्षक (Natural Guardian) हो, अपनी मर्जी से नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी अन्य व्यक्ति को नहीं सौंप सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि बच्चों की कस्टडी का हस्तांतरण कानून और नैतिकता के सिद्धांतों के विपरीत है।

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एकलपीठ के फैसले को खंडपीठ ने किया खारिज

यह मामला प्रयागराज के नाबालिग बच्चों,युवराज और आयुष्मान की ओर से दाखिल एक विशेष अपील पर आया है। इससे पहले हाई कोर्ट की एकलपीठ ने एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पिता को अपने बच्चों की अभिरक्षा 'किसी भी व्यक्ति' को देने का पूर्ण अधिकार है। खंडपीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पिता का यह अधिकार असीमित नहीं है और इसे चुनौती दी जा सकती है।

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क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, बच्चों के पिता ने उनकी मां को अभिरक्षा देने के बजाय बच्चों को किसी तीसरे पक्ष को सौंप दिया था। इसे 'अवैध निरुद्धि' (Illegal Detention) मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई थी। अब खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए मामले को फिर से सुनवाई के लिए रखा है। कोर्ट ने साफ किया कि बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है और कस्टडी के अधिकार का मनमाना हस्तांतरण नहीं किया जा सकता।

Location :  Prayagraj

Published :  30 April 2026, 6:35 AM IST