
नई दिल्ली: वक्फ बिल में संशोधन को लेकर सियासत गरमाई हुई है। पूरे देश में इस बिल ने हलचल मचा दी है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजीजू ने बुधवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पेश किया। लेकिन विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। इस बिल को लेकर मुस्लिम समाज में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार,जहां एक वर्ग इस बिल का समर्थन कर रहा है तो वहीं कुछ मुस्लिम समाज के लोग इसे सरकार का अल्पसंख्यक धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश मान रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए लाया गया है, जबकि विपक्ष और आलोचक इसे सरकारी नियंत्रण की एक रणनीति मान रहे हैं। आइए डाइनामाइट न्यूज़ की रिपोर्ट में जानते हैं वक्फ बिल क्या है और इस नए संशोधन से पहले और अब के कानूनों में क्या अंतर हैं।
वक्फ का अर्थ क्या है?
‘वक्फ’ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है "रोकना" या "ठहरना"। यह उस स्थिति को दर्शाता है जब कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति, चाहे वह जमीन, घर, पैसा, या अन्य मूल्यवान वस्तु हो, इसे धार्मिक उद्देश्य के लिए दान कर देता है। वक्फ की संपत्ति को ‘अल्लाह की संपत्ति’ कहा जाता है और इसे दान करने वाले व्यक्ति को ‘वकिफ’ कहा जाता है। इस दान से मिलने वाली संपत्ति का उपयोग समाज के गरीब, जरुरतमंदों और धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है।
नए वक्फ बिल में क्या बदलाव हैं?
वक्फ संपत्ति का दान: नए बिल में यह प्रावधान किया गया है कि अब केवल वही व्यक्ति अपनी संपत्ति वक्फ कर सकता है। जिसने कम से कम पांच वर्षों तक इस्लाम धर्म का पालन किया हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही व्यक्ति वक्फ संपत्ति का दान कर सके। जो धर्म से जुड़ा हुआ हो।
विवादों का निपटान: दान की गई संपत्ति से जुड़ा कोई भी विवाद अब तुरंत जांच के बाद निपटाया जाएगा। इसका मतलब है कि यदि किसी वक्फ संपत्ति पर विवाद होता है, तो उसे पहले जांचा जाएगा और फिर सही निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा।
वक्फ बोर्ड में बदलाव: पुराने कानून में वक्फ बोर्ड के सदस्यों में मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों ही सदस्य होते थे लेकिन अब नए बिल के तहत गैर-मुस्लिम सदस्यों को बोर्ड में शामिल नहीं किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि अब वक्फ बोर्ड में केवल मुस्लिम सदस्य ही होंगे। जिससे बोर्ड का सदस्य समूह और स्पष्ट होगा।
वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला: पुराने कानून के अनुसार यदि किसी वक्फ संपत्ति पर दावा किया जाता था, तो उसे वक्फ ट्रिब्यूनल में अपील करने का अधिकार था और ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम होता था। अब नए बिल के अनुसार ट्रिब्यूनल का फैसला न केवल अंतिम माना जाएगा, बल्कि इस पर किसी प्रकार की चुनौती भी नहीं दी जा सकती।
पुराने वक्फ बिल में क्या था?
पुराने वक्फ कानून के तहत वक्फ बोर्ड के निर्णयों को चुनौती नहीं दी जा सकती थी और वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम होता था। इसके अलावा वक्फ संपत्तियों पर किसी भी प्रकार के विवाद का समाधान ट्रिब्यूनल के माध्यम से ही किया जाता था। पुराने कानून में महिलाओं और अन्य धर्मों के व्यक्तियों को वक्फ बोर्ड के सदस्य के रूप में शामिल करने का प्रावधान नहीं था, जो कि एक प्रमुख आलोचना का विषय था। इसके अलावा वक्फ संपत्तियों पर कोई भी धार्मिक स्थल जैसे मस्जिद, स्वचालित रूप से वक्फ संपत्ति मानी जाती थी और इस पर किसी प्रकार की विवाद की स्थिति का समाधान वक्फ बोर्ड द्वारा किया जाता था।
भारत में वक्फ कानून का इतिहास
भारत में वक्फ कानून की शुरुआत 12वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के दौरान हुई थी। स्वतंत्रता के बाद भारत में पहला वक्फ एक्ट 1954 में बनाया गया था। जिसमें वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को नियंत्रित किया गया। इसके बाद 1995 और 2013 में भी इस कानून में कई संशोधन किए गए थे। 2013 के बाद इस कानून में कुछ और संशोधन किए गए और अब 2025 में एक नया वक्फ संशोधन बिल पेश किया गया है, जिसमें कई बदलाव किए गए हैं। जिसपर 8 घंटे की बहस होगी और फिर वोटिंग होगी।
Published : 2 April 2025, 3:49 PM IST
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