कभी हार न मानने वाले जज्बे की दास्तान हैं सीमा, कड़े संघर्ष से राष्ट्रमंडल खेलों में अपने नाम किया ऐतिहासिक कांस्य पदक

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला चक्का फेंक स्पर्धा का कांस्य जीतने वाली सीमा कालीरामना की कहानी हर दिल जीत लेगी। मां बनने के 11 महीने बाद वापसी, पीएचडी की पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन बना कर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले से हर मंजिल हासिल की जा सकती है।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 31 July 2026, 12:22 PM IST

New Delhi: जब हौसले बुलंद हों, तो दुनिया की कोई भी रुकावट आपके सपनों को रोक नहीं सकती। इस बात को एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है हरियाणा की 27 वर्षीय एथलीट सीमा कालीरामना ने। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला चक्का फेंक (डिस्कस थ्रो) स्पर्धा का कांस्य पदक महज एक मेडल भर नहीं है, बल्कि यह मातृत्व, उच्च शिक्षा के कड़े संघर्ष और कभी हार न मानने वाले जज्बे की वह दास्तान है, जो हर किसी का दिल जीत लेगी।

अंतिम पलों का रोमांच और वो जादुई थ्रो

ग्लॉसगो के मैदान पर मुकाबला बेहद रोमांचक और तनाव से भरा था। सीमा की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और उनका पहला प्रयास फाउल हो गया। हालांकि, उन्होंने दूसरे प्रयास में 57.32 मीटर और तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर का शानदार थ्रो फेंककर कांस्य पदक पर अपना मजबूत दावा ठोक दिया।

इसके बाद उनके अगले तीनों प्रयास (चौथा, पांचवां और छठा) फाउल हो गए। अब सबकी निगाहें प्रतिद्वंद्वियों के प्रदर्शन पर टिकी थीं। कैमरून की एथलीट मोनी नोरा अटिम यदि अपने अंतिम प्रयास में 58.65 मीटर के आंकड़े को पार कर जातीं, तो सीमा के हाथ से पदक निकल सकता था। वे कुछ सेकंड्स बेहद तनावपूर्ण थे, लेकिन जैसे ही अटिम का अंतिम प्रयास असफल घोषित हुआ, सीमा का चेहरा खुशी और सुकून भरी मुस्कान से खिल उठा। वर्षों की मेहनत और त्याग आखिरकार रंग ले आए थे। इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक जमैका की समांथा हॉल (61.66 मीटर) और रजत कनाडा की जूलिया टंक्स (60.67 मीटर) के नाम रहा, जबकि भारत की ही निधि रानी 57.10 मीटर के साथ चौथे स्थान पर रहीं।

देश की सबसे ताकतवर महिलाओं का जलवा: 39 लाख करोड़ की मालकिन हैं 117 वुमन लीडर्स, फिनलैंड की जीडीपी भी पीछे

मातृत्व और पीएचडी के बीच संतुलन की चुनौती

सीमा कालीरामना की यह वापसी भारतीय एथलेटिक्स इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में से एक है। वह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट ही नहीं हैं, बल्कि भिवानी स्थित चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय से शारीरिक शिक्षा (फिजिकल एजुकेशन) में पीएचडी की रिसर्च स्कॉलर भी हैं।

इसी दौरान उनकी जिंदगी में एक और बड़ी जिम्मेदारी आई और उन्होंने बेटे रुद्र को जन्म दिया। आमतौर पर कई महिला खिलाड़ियों के लिए मां बनने के बाद खेल की दुनिया में वापसी करना बेहद कठिन होता है। शरीर की ताकत और पुरानी तकनीक को वापस पाना आसान नहीं था, लेकिन सीमा ने हार नहीं मानी। उन्होंने बेटे के जन्म के महज 11 महीने बाद ही दोबारा कड़ा प्रशिक्षण शुरू कर दिया और अपनी पढ़ाई के साथ इसे पूरी शिद्दत से जारी रखा।

पति और कोच का मिला मजबूत साथ

इस कठिन सफर में सीमा के पति रविंद्र (मोनू कालीरामना) उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे। पूर्व राष्ट्रीय स्तर के चक्का फेंक खिलाड़ी रहे रविंद्र ही आज उनके कोच भी हैं। उन्होंने न केवल सीमा को तकनीकी रूप से मजबूत किया, बल्कि मानसिक मोर्चे पर भी उनका पूरा साथ दिया। इसी कड़ी मेहनत का नतीजा था कि सीमा ने साल 2025 के राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर यह साफ संकेत दे दिया था कि वह अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश का झंडा बुलंद करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

आज भारत की झोली में कितने गोल्ड आएंगे? नीरज चोपड़ा समेत 10 मुक्केबाजों पर टिकी करोड़ों निगाहें

सपनों को नई उड़ान देती एक प्रेरणा

सीमा कालीरामना का यह कांस्य पदक उन तमाम महिलाओं और बेटियों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो यह मान बैठती हैं कि शादी, मातृत्व या उच्च शिक्षा की जिम्मेदारियों के बाद उनके सपने अधूरे रह जाते हैं। सीमा ने अपने दृढ़ संकल्प से यह साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो जिंदगी की हर नई जिम्मेदारी सफलता के रास्ते की रुकावट नहीं, बल्कि उसे पाने की सीढ़ी बन जाती है।

Location :  New Delhi

Published :  31 July 2026, 12:21 PM IST