तकनीकी युग में मन के संघर्ष से जूझते युवाओं के लिए भगवद्गीता बनी जीवन की राह दिखाने वाली शक्ति

विज्ञान और तकनीक के तीव्र विस्तार के बीच युवा वर्ग मानसिक तनाव, तुलना और पहचान के संकट से जूझ रहा है। ऐसे समय में भगवद्गीता आत्मबोध, स्वधर्म और भावनात्मक संतुलन के माध्यम से संतुलित, उद्देश्यपूर्ण और नैतिक जीवन की प्रेरणा देती है।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 21 February 2026, 5:49 PM IST

New Delhi: विज्ञान और तकनीक के तीव्र विकास ने 21वीं सदी के युवाओं के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल मंचों ने जहां ज्ञान और वैश्विक संपर्क के नए द्वार खोले हैं, वहीं मानसिक तनाव, तुलना, अवसाद और पहचान के संकट जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे परिवर्तित परिदृश्य में भगवद्गीता को एक कालातीत मार्गदर्शिका के रूप में देखा जा रहा है, जो आधुनिक युवा पीढ़ी को मानसिक संतुलन और नैतिक स्पष्टता प्रदान कर सकती है। ऐसा कहना है फेयरफील्ड तकनीकी एवं प्रबंधन संस्थान के निदेशक, प्रो. (डॉ) सरोज व्यास का।

तकनीकी युग का नया युद्धक्षेत्र

डिजिटल क्रांति ने युवाओं के सोचने, समझने और संवाद करने के तरीके को बदल दिया है। सोशल मीडिया पर निरंतर तुलना, लाइक्स और फॉलोअर्स की प्रतिस्पर्धा तथा आभासी पहचान की होड़ ने आत्म-सम्मान को बाहरी स्वीकृति पर निर्भर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति किसी मानसिक युद्धक्षेत्र से कम नहीं है।

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यह परिस्थिति उस समय की याद दिलाती है जब महाभारत के युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन गहरे द्वंद्व और मोह में डूब गए थे। आज का युवा भी करियर, नैतिकता, सफलता और सामाजिक मान्यता के बीच इसी प्रकार के आंतरिक संघर्ष का सामना कर रहा है।

भगवद्गीता का दार्शनिक संदेश

भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का व्यावहारिक मार्ग भी प्रस्तुत करते हैं। गीता का मूल संदेश है- स्पष्ट चिंतन, कर्तव्यनिष्ठ कर्म, भावनात्मक संतुलन और आत्मबोध।

गीता के तृतीय अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक "श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः…"  में स्वधर्म के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसका आशय है कि व्यक्ति को अपनी प्रकृति और कर्तव्य के अनुरूप जीवन जीना चाहिए, न कि दूसरों की नकल में अपनी पहचान खोनी चाहिए। डिजिटल युग में यह शिक्षा विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ तुलना और अनुकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक स्पष्टता की आवश्यकता

तकनीकी उपकरणों की अत्यधिक निर्भरता ने युवाओं में भावनात्मक उदासीनता, अकेलापन और तनाव को बढ़ाया है। आभासी दुनिया में सक्रिय रहने के बावजूद वास्तविक संबंध कमजोर हो रहे हैं।मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आत्म-जागरूकता और भावनात्मक नियंत्रण की कमी इन समस्याओं को और गहरा करती है।

गीता ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग जैसे मार्गों के माध्यम से जीवन को संतुलित दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। यह पलायन नहीं, बल्कि परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करने की शिक्षा देती है। आधुनिक संदर्भ में यह संदेश युवाओं को आत्मविश्वास, धैर्य और नैतिक साहस प्रदान कर सकता है।

तकनीक और संस्कृति के बीच संतुलन

विशेषज्ञों का मत है कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसके प्रति अनियंत्रित आसक्ति चुनौती बनती है। पाश्चात्य प्रभाव और डिजिटल प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने कई युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर किया है। ऐसे में गीता का आत्ममंथन और आत्मनियंत्रण का सिद्धांत संतुलित जीवन की दिशा दिखा सकता है।

शिक्षाविदों का मानना है कि यदि शिक्षा प्रणाली में गीता के मूल्यों- कर्तव्यपरायणता, अनुशासन, समर्पण और नैतिक निर्णय क्षमता को समाहित किया जाए, तो युवाओं को जीवन की जटिलताओं से निपटने की सशक्त दिशा मिल सकती है।

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विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को गति और सुविधा प्रदान की है, परंतु मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन का समाधान केवल बाहरी साधनों से संभव नहीं है। आज के दौर में भगवद्गीता व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में संतुलन स्थापित करने की प्रभावी मार्गदर्शिका बनकर उभर रही है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय के साथ गीता आधुनिक तकनीकी चुनौतियों के बीच एक सेतु का कार्य कर सकती है। संतुलित और प्रामाणिक जीवन की खोज में लगे युवाओं के लिए यह ग्रंथ आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सदियों पूर्व था।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 21 February 2026, 5:49 PM IST