झारखंड में छुपा है सूर्य देव का अनोखा उत्सव, जानिए क्या अलग करता इसे छठ पूजा से

छठ पूजा की ही तरह सूर्य देव को समर्पित सुरजही पूजा झारखंड का एक विशिष्ट धार्मिक आयोजन है। कुम्भ जैसे पर्वों की तरह इसका आयोजन भी एक निश्चित अंतराल के बाद आता है। जाने क्या हैं इसकी मान्यताएं और क्या अलग करता है इसको छठ पूजा से, खबर में आगे…

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 2 February 2026, 7:59 PM IST

New Delhi: सूर्याहु पूजा या सुरजही पूजा झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में सूर्य देव को समर्पित एक प्राचीन लोकपर्व है। यह पूजा परिवार की सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। यह परंपरा मुख्य रूप से सदान (Sadan) समुदाय से जुड़ी मानी जाती है और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है।

सूर्याहु पूजा की परंपरा और मान्यता

सूर्याहु पूजा अगहन, माघ या चैत महीने में तीन दिनों तक आयोजित की जाती है। पूजा घर के आंगन में पूर्ण पवित्रता के साथ की जाती है, जहां सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर परंपरागत रूप से सफेद बकरे की बलि देने की भी प्रथा है।

मान्यता है कि यह पूजा सामान्यतः हर पांच वर्ष के अंतराल पर की जाती है। हालांकि, कुछ परिवार इसे 12 वर्ष या 15 वर्ष के अंतराल पर भी करते हैं। जब भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, तब वे सूर्य देव की कृपा के प्रति आभार प्रकट करने के लिए इस अनुष्ठान का आयोजन करते हैं।

सूर्य देव की आराधना में जल, फूल, फल, और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। श्रद्धालु सूर्य स्तुति कर परिवार की उन्नति और कल्याण की कामना करते हैं।

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दही-चूड़ा: सूर्य देव का प्रिय भोग

देवघर क्षेत्र में विशेष मान्यता है कि सूर्य देव को दही-चूड़ा अत्यंत प्रिय है। कहा जाता है कि इस प्रसाद के अर्पण से भगवान भास्कर प्रसन्न होते हैं और भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पूजा के बाद दही-चूड़ा और अन्य प्रसाद का वितरण किया जाता है।

कौन करता हैं सूर्याहु पूजा

झारखंड में सदान (Sadan) समुदाय गैर-जनजातीय मूलनिवासी माने जाते हैं। यह समुदाय सदानी भाषाएं जैसे खोरठा, नागपुरी, कुरमाली और पंचपरगनिया बोलता है तथा मुख्य रूप से कृषि पर आधारित जीवन शैली अपनाता है। इस समुदाय में कुड़मी, तेली, बड़ाइक, राजपूत, ब्राह्मण, सोनार, माली आदि जातियां शामिल हैं, जो ऐतिहासिक रूप से छोटानागपुर क्षेत्र में निवास करती रही हैं।

सूर्यदेव को समर्पित है सुरजही पूजा (Img- Internet)

छठ पूजा से कैसे अलग है सुरजही पूजा

छठ पूजा और सुरजही पूजा दोनों ही सूर्य उपासना से जुड़े पर्व हैं, लेकिन इनमें स्पष्ट अंतर है। छठ पूजा हर वर्ष कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाई जाती है और इसमें डूबते व उगते सूर्य के साथ छठी मैया की पूजा होती है।

वहीं, सुरजही पूजा नियमित वार्षिक पर्व नहीं है। यह आमतौर पर हर पांच वर्ष या मनोकामना पूर्ण होने पर घर के आंगन में की जाती है और मुख्य रूप से सूर्य देव को समर्पित होती है।

देवघर के पथरड्डा गांव में मनाया गया सूर्याहु पर्व

देवघर प्रखंड की ग्राम पंचायत पथरड्डा में आस्था का महापर्व सूर्याहु डाली पर्व धूमधाम से मनाया गया। रविवार शाम को भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना कर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया गया, जबकि सोमवार सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर तीन दिवसीय अनुष्ठान का समापन हुआ।

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आयोजकों के अनुसार, लगभग 15 वर्षों बाद गांव में सूर्याहु डाली पर्व का आयोजन हुआ। इस अवसर पर व्रती सीता देवी समेत अन्य श्रद्धालुओं ने लगातार 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना की। शनिवार शाम खरना के बाद महाप्रसाद का वितरण किया गया।

रविवार को गांव की पतरो नदी घाट पर फल और पकवानों से सजी दर्जनों डालियां लेकर श्रद्धालु पहुंचे। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया गया। इस दौरान गांव और आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु घाट पर पहुंचे और भगवान भास्कर का आशीर्वाद लिया। सोमवार सुबह उगते सूर्य को पुनः अर्घ्य देकर अनुष्ठान पूर्ण किया गया।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 2 February 2026, 7:59 PM IST