दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश का वो कोना, जहाँ अल्लाह के बंदे भी करते हैं शिव की इबादत… जानिए इस अनोखे धाम का राज

दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश में एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जिसका इतिहास और वहां की परंपराएं हर किसी को हैरान कर देती हैं। आखिर क्या है उस प्राचीन जगह का रहस्य और क्यों वहां के लोग सदियों से सिर झुकाते हैं? इस हैरान कर देने वाली सच्चाई को जानकर आप भी सोच में पड़ जाएंगे।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 9 July 2026, 3:56 PM IST

New Delhi: दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश- इंडोनेशिया। करीब 29 करोड़ की मुस्लिम आबादी के बीच बसा जावा द्वीप का यह क्षेत्र आज एक अद्भुत सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ गर्व से सिर उठाए खड़ा है भगवान शिव का एक ऐसा भव्य मंदिर, जिसे देखकर दुनिया दंग रह जाती है। यह सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हजार साल पुरानी उस सांस्कृतिक यात्रा की गवाही है जिसने भारत और इंडोनेशिया को एक अदृश्य धागे में बांध रखा है।

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद यहाँ के मुस्लिम भी इस शिव धाम को नमन करते हैं, इसके संरक्षण में हाथ बंटाते हैं और इस साझी विरासत पर गर्व करते हैं। हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ मिलकर यहाँ के संरक्षण और जीर्णोद्धार परियोजना का उद्घाटन किया। भगवा कुर्ता, माथे पर त्रिपुंड और पारंपरिक अंदाज में जब पीएम मोदी इस मंदिर में पहुंचे, तो यह तस्वीरें वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गईं।

मताराम साम्राज्य की विरासत और इतिहास

प्रम्बानन मंदिर (जिसे स्थानीय भाषा में ब्रह्मानंद या परमब्रह्म मंदिर भी कहा जाता है) का इतिहास करीब 1170 साल पुराना है। 9वीं सदी ईस्वी में हिंदू मताराम साम्राज्य के दौरान इसका निर्माण शुरू हुआ था। माना जाता है कि राजा राकाई पिकाटन ने इसे बनवाना शुरू किया और उनके उत्तराधिकारी लोकापाला ने इसे पूरा किया। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण साम्राज्य द्वारा शैव हिंदू धर्म को अपनाने के प्रतीक के तौर पर और प्रतिद्वंद्वी शैलेंद्र राजवंश द्वारा बनाए गए बौद्ध बोरोबुदुर मंदिर के जवाब में किया गया था।

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मुस्लिम देश में गूंजती है रामायण और कृष्ण कथा

दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश होने के बावजूद इंडोनेशिया की रगों में आज भी रामायण और महाभारत बहती है। यहाँ की मुस्लिम आबादी न केवल इस मंदिर का सम्मान करती है, बल्कि इस परिसर में हर साल आयोजित होने वाले भव्य 'रामायण मंचन' को देखने के लिए स्थानीय मुस्लिमों के साथ-साथ दुनिया भर से लाखों पर्यटक पहुँचते हैं।

इस देश की संस्कृति में भारतीयता का प्रभाव इतना गहरा है कि-

गणेश जी की तस्वीर: यहाँ के नोटों पर ज्ञान और शिक्षा के प्रतीक के रूप में भगवान गणेश की तस्वीर छपी हुई है।

अर्जुन-कृष्ण रथ: जकार्ता के बीचों-बीच 85 फीट ऊंची अर्जुन और श्री कृष्ण के रथ की भव्य प्रतिमा लगी है।

गरुड़ एयरलाइंस: इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एयरलाइन का नाम 'गरुड़ इंडोनेशिया' है, जिसका उल्लेख हमारे वेदों और शास्त्रों में मिलता है।

संस्कृत का प्रभाव: नौसेना का आधिकारिक आदर्श वाक्य 'ज्वेल जयामहे' संस्कृत में है और राष्ट्रीय नारा जापानी ग्रंथ काकाबिन समसेतु से प्रेरित है, जिसमें संस्कृत के कई शब्द हैं।

अद्भुत वास्तुकला: कंबोडिया के अंकोरवाट से तुलना

दक्षिण-पूर्व एशिया में कंबोडिया के अंकोरवाट के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा और पूरी तरह हिंदू आस्था को समर्पित सबसे विशाल मंदिर कॉम्प्लेक्स है। मूल रूप से लगभग 40 हेक्टेयर में फैले इस परिसर में 240 से ज्यादा मंदिर थे। ज्वालामुखी के पत्थरों से बने इन मंदिरों की ऊंचाई और शिखर शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला की याद दिलाती है। इसकी लंबी गैलरियों की दीवारों पर रामायण और भागवत पुराण की कथाएं बारीक नक्काशी के रूप में उकेरी गई हैं, जो इस परिसर को हिंदू पुराणों का एक जीवंत संग्रहालय बनाती हैं।

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त्रिमूर्ति पूजा का केंद्र और 47 मीटर ऊंचा शिव शिखर

यह मंदिर परिसर मुख्य रूप से 'त्रिमूर्ति' (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की पूजा का प्रमुख केंद्र है।

मुख्य शिव मंदिर: परिसर का सबसे मुख्य और बड़ा मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर है। दूर से देखने पर यह पत्थर के पर्वत जैसा प्रतीत होता है।

ब्रह्मा और विष्णु मंदिर: शिव मंदिर के दाईं ओर भगवान विष्णु और बाईं ओर भगवान ब्रह्मा का मंदिर है।

पवित्र वाहन: इन तीनों मुख्य मंदिरों के ठीक सामने उनके वाहनों के मंदिर भी बने हैं, जिनमें शिव के वाहन नंदी बैल का मंदिर सबसे प्रमुख है, साथ ही गरुड़ और हंस के मंदिर भी मौजूद हैं।

खंडहर से जीर्णोद्धार तक का सफर और यूनेस्को का दर्जा

10वीं सदी में माउंट मेरापी में ज्वालामुखी फटने और जावा में राजनीतिक सत्ता बदलने के कारण इस मंदिर परिसर को छोड़ दिया गया था। सदियों तक आए ज़बरदस्त भूकंपों और प्राकृतिक आपदाओं ने इसे खंडहर में बदल दिया। 19वीं सदी में डच प्रशासन के तहत इसे सहेजने की कोशिशें शुरू हुईं और 1913 से 1953 के बीच बड़े पैमाने पर इसके पुनर्निर्माण से कई मुख्य मंदिरों को पुरानी शान वापस मिली। इसकी असाधारण ऐतिहासिक अहमियत को देखते हुए यूनेस्को ने 1991 में इसे 'विश्व धरोहर स्थल' का दर्जा दिया।

भारत-इंडोनेशिया की दोस्ती को मजबूत करेगी 'एएसआई' की तकनीक

वर्ष 2025 में भारत और इंडोनेशिया के बीच हुए एक ऐतिहासिक समझौते के तहत अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस मंदिर के संरक्षण में अपनी विशेषज्ञता दे रहा है। इसके तहत 'मूल पत्थरों को आपस में जोड़कर पुनर्निर्माण' करने की प्राचीन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

पीएम मोदी ने इस अवसर पर कहा कि सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ और महाकाल के बाद प्रम्बानन मंदिर के विकास से जुड़ना उनका सौभाग्य है। भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' और सांस्कृतिक कूटनीति के तहत चलाया जा रहा यह प्रोजेक्ट दोनों देशों के बीच की 2000 साल पुरानी दोस्ती और साझी सभ्यता को एक नई मजबूती दे रहा है।

Location :  New Delhi

Published :  9 July 2026, 3:56 PM IST