
अधिक पूर्णिमा (Img- Internet)
New Delhi: हिंदू धर्म और शास्त्रों में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन जब यह पूर्णिमा अधिक मास में पड़ती है, तो इसका महत्व और शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। अधिक मास में आने वाली इस पूर्णिमा को 'अधिक पूर्णिमा' कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह आम पूर्णिमा की तुलना में कहीं अधिक फलदायी और कल्याणकारी होती है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। इस अत्यंत पवित्र दिन पर किए गए धार्मिक अनुष्ठानों का फल कभी नष्ट नहीं होता।
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर आता है। इसी समयावधि और ऋतुओं के संतुलन को बनाए रखने के लिए हर तीसरे साल यानी लगभग ढाई से तीन वर्ष के अंतराल पर कैलेंडर में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। सनातन परंपरा में इस अतिरिक्त महीने को 'अधिक मास', 'मलमास' या 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जाना जाता है। कई वर्षों के लंबे इंतजार के बाद इस पावन महीने में जो पूर्णिमा आती है, उसे ही अधिक पूर्णिमा कहा जाता है।
विष्णु सहस्रनाम के दिव्य पाठ में भगवान विष्णु का एक नाम 'पुरुषोत्तम' वर्णित है, जिसका अर्थ है 'पुरुषों में सबसे उत्तम'। चूंकि इस अतिरिक्त मास के अधिपति स्वयं भगवान श्रीहरि हैं, इसलिए इस महीने की पूर्णिमा पर उनका सीधा प्रभाव होता है।
आम पूर्णिमाओं पर मुख्य रूप से चंद्र देव और माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है, लेकिन अधिक पूर्णिमा के महासंयोग पर भगवान नारायण और महालक्ष्मी की संयुक्त पूजा का विधान है। इस दिन सच्चे मन से की गई साधना से साधक को विष्णु जी के साथ-साथ धन की देवी लक्ष्मी जी का भी विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, नारदपुराण और भविष्यपुराण जैसे महान सनातन ग्रंथों में इस तिथि को 'सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा' की संज्ञा दी गई है। यह वह अद्वितीय तिथि है जो मनुष्य के जीवन के सभी कष्टों, दुखों और दरिद्रता को दूर कर सिद्धियों के द्वार खोलती है। विभिन्न पुराणों में स्पष्ट उल्लेख है कि इस पावन अवसर पर किया गया दान, जप, तप, व्रत और सत्यनारायण की कथा का श्रवण करने से जातक को 100 यज्ञों के अनुष्ठान के समान महापुण्य प्राप्त होता है।
अधिक पूर्णिमा को 'अक्षय पुण्य' प्रदान करने वाली तिथि माना गया है, जिसका अर्थ है कि इस दिन अर्जित किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष आराधना करने से मनुष्य के जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का शमन हो जाता है। यह पवित्र तिथि जातक को सांसारिक सुखों का भोग कराते हुए अंत में मोक्ष की ओर अग्रसर करती है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और दीपदान कर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं।
Location : New Delhi
Published : 30 May 2026, 12:00 PM IST