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सौरव दास और आशुतोष रंका (Image: X)
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि जब जंतर-मंतर को लेकर संबंधित आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई थी, तो वे दोबारा वहां प्रदर्शन करने क्यों पहुंचे। अदालत ने कहा कि दोनों नेताओं ने पहले बॉन्ड दिया था, लेकिन कथित तौर पर फिर से शांति भंग होने की स्थिति पैदा हुई। ऐसे में अधिकारियों के पास सख्त कार्रवाई करने के अधिकार पर भी विचार करना होगा।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका वाले मामलों में प्रदर्शनकारियों की पहचान, संगठन और आंदोलन के उद्देश्य जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब संबंधित आदेश के खिलाफ रिवीजन का विकल्प उपलब्ध है, तो याचिकाकर्ता सीधे अनुच्छेद 226 के तहत अदालत क्यों आए हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि दोनों नेता पहले संबंधित ट्रायल कोर्ट में दोपहर दो बजे होने वाली सुनवाई का इंतजार करें।
अदालत ने कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट से राहत मिल जाती है, तो हाईकोर्ट में मामले को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं रह सकती। वहीं, राहत नहीं मिलने पर याचिकाकर्ता कानून के मुताबिक दूसरे विकल्प अपना सकते हैं।
सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि दोनों को पर्सनल बॉन्ड पर रिहा किया जाना चाहिए। उन्होंने जमानतदारों की मांग से जुड़े आदेश पर भी विचार करने की अपील की।
इस पर कोर्ट ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता आज नए जमानतदार पेश कर रहे हैं। वकील ने जवाब दिया कि वह पहले भी कई बार जमानतदार पेश कर चुके हैं। अदालत ने सवाल किया कि जमानतदार को खारिज करने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है या नहीं। वकील ने कहा कि उनकी राय में इसके खिलाफ अपील का विकल्प मौजूद है।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या अपीलीय अदालत जमानतदारों की वैधता से जुड़े मुद्दों पर विचार कर सकती है। इसके बाद अदालत ने संबंधित कानूनी प्रावधानों को देखने की बात कही।
सुनवाई के दौरान वकील अभिक चिमनी ने दलील दी कि 19 अक्टूबर का आदेश गलत है, क्योंकि उनके मुताबिक अधिकारियों के पास हिरासत बढ़ाने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। उन्होंने एहतियाती कार्रवाई को भी मनमाना बताते हुए कहा कि जमानतदारों को खारिज किए जाने के कारण दोनों नेताओं को अतिरिक्त समय तक हिरासत में रहना पड़ सकता है।
वकील ने कहा कि अगर याचिका वापस लेने के बाद जमानतदारों को फिर खारिज कर दिया गया, तो उन्हें दोबारा हाईकोर्ट आना पड़ेगा। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिका की कॉपी-पेस्ट करके दो दिन बाद फिर अदालत में आया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि आजादी बेहद पवित्र है, लेकिन जब कानून में दूसरा उपाय उपलब्ध हो, तो उस पर भी विचार करना होगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील से फिर पूछा कि वे दूसरे कानूनी विकल्पों के बजाय सीधे अनुच्छेद 226 के तहत क्यों आए हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सौरव दास की उम्र 27 साल और आशुतोष रांका की उम्र 32 साल बताए जाने के बाद Gen-Z की परिभाषा को लेकर भी सवाल किया। अदालत ने टिप्पणी की कि जुलाई में हुआ प्रदर्शन छात्रों से जुड़ा था, जबकि मौजूदा मामले में मुद्दे अलग हैं। राज्य की ओर से ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि दोनों नेताओं को संबंधित आदेश के अनुसार पेश किया जाना है और उन्हें नए जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया है।
फिलहाल उपलब्ध सुनवाई विवरण में हाईकोर्ट की ओर से याचिका पर अंतिम फैसला सुनाए जाने की जानकारी नहीं है। ऐसे में दोनों नेताओं को राहत मिलेगी या नहीं, यह ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही और आगे होने वाले न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगा।
Location : New Delhi
Published : 21 October 2026, 1:31 PM IST