
पाकिस्तान के इलाके में है ईरान के विमान (Img: Google)
दो अमेरिकी अधिकारियों का हवाला देते हुए, एक मीडिया रिपोर्ट में इसका दावा किया कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान, पाकिस्तान ने चुपके से ईरानी विमानों को अपने हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी थी। रिपोर्ट में कहा गया कि जहां एक तरफ पाकिस्तान अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता था, वहीं दूसरी तरफ वह साथ ही साथ ईरान को भी समर्थन दे रहा था।
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इस पूरे घटनाक्रम के बाद, पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अमेरिका के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम जिन्हें राष्ट्रपति ट्रंप का करीबी सहयोगी माना जाता है । ने मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका की "पूरी समीक्षा" करने की मांग की है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की ओर से ऐसे कदम पर उन्हें कोई हैरानी नहीं होगी, और उन्होंने यह भी ज़िक्र किया कि इस्लामाबाद पहले भी इज़रायल को लेकर विवादित बयान दे चुका है।
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इस बीच एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन के भीतर ही पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन के कुछ अधिकारियों को शक है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने ईरान के पक्ष को वास्तविकता से कहीं ज़्यादा बेहतर ढंग से पेश किया है। कुछ अधिकारियों का यह भी मानना है कि तेहरान के साथ बातचीत के दौरान पाकिस्तान अमेरिकी नाराज़गी की गंभीरता को सही ढंग से बताने में नाकाम रहा।
खबरों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका को जो जवाब भेजा था, वह भी पाकिस्तान के ज़रिए ही वॉशिंगटन तक पहुँचाया गया था। नतीजतन, पाकिस्तान की दोहरी रणनीति को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर अविश्वास और गहरा गया है।
लंबे समय से, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अपने संबंधों में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। हालाँकि, ईरानी सैन्य विमानों की मौजूदगी को लेकर हाल में हुए खुलासों ने उसकी इस कूटनीतिक संतुलन की नीति को कड़ी जांच के दायरे में ला खड़ा किया है। विश्लेषकों की चेतावनी है कि अगर यह विवाद और बढ़ता है, तो पाकिस्तान को अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
Location : New Delhi
Published : 12 May 2026, 2:55 PM IST