The MTA Speaks: देश में अचानक क्यों बढ़े तलाक के मामले? क्या है वजह और किस उम्र में अलग हो रहे हैं कपल? जानिये सबकुछ

आज के इस सटिक विश्लेषण में हम बात कर रहे हैं एक ऐसे ज्वलंत सामाजिक बदलाव की, जो चुपचाप लेकिन बहुत तेजी से हमारे समाज की बुनियाद को प्रभावित कर रहा है। दरअसल यहां बात की जा रही है तलाक की। तलाक को लेकर सीनियर जर्नलिस्ट मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने ‘The MTA Speaks’ में इसका सटिक विश्लेषण किया है।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 25 February 2026, 5:19 PM IST

New Delhi: देश के चर्चित शो The MTA Speaks में आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे ज्वलंत सामाजिक बदलाव की, जो चुपचाप लेकिन बहुत तेजी से हमारे समाज की बुनियाद को प्रभावित कर रहा है। भारत में विवाह को सदियों से एक पवित्र बंधन माना गया है, सात जन्मों का साथ कहा गया है, परिवारों का मिलन माना गया है। लेकिन बदलते समय, बदलती अर्थव्यवस्था, बदलती सोच और बदलती प्राथमिकताओं के बीच अब विवाह की परिभाषा भी बदल रही है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 20 वर्षों में तलाक के मामलों में लगभग 50 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

सीनियर जर्नलिस्ट मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने स्पेशल शो 'The MTA Speaks' में तलाक क्यों हो रहे हैं ज्यादा इसका सटिक विश्लेषण किया है।

पिछले 20 वर्षों में तलाक के मामलों में लगभग 50 प्रतिशत तक की वृद्धि सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह समाज के भीतर चल रहे गहरे परिवर्तन का संकेत है। सबसे अहम बात यह है कि अब तलाक के मामलों में पहल करने वालों में 58 प्रतिशत महिलाएं हैं। यानी आधे से ज्यादा मामलों में महिलाएं खुद अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे आर्थिक आत्मनिर्भरता, शिक्षा का प्रसार, कानूनी जागरूकता और आत्मसम्मान की भावना जैसे कई कारक काम कर रहे हैं। जो महिलाएं पहले सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता या परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर असंतुष्ट विवाह को ढोती थीं, वे अब अपने जीवन के फैसले खुद लेने का साहस दिखा रही हैं।

क्या है तलाक लेने वाली महिलाओं की औसत आयु?

एक अध्ययन के अनुसार तलाक लेने वाली महिलाओं की औसत आयु लगभग 31 वर्ष है, जबकि पुरुषों की औसत आयु 36 वर्ष पाई गई है। इसका मतलब है कि यह निर्णय जीवन के उस दौर में लिया जा रहा है जब करियर, आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत पहचान मजबूत हो चुकी होती है। फैमिली कोर्ट से जुड़े अध्ययनों में सामने आया है कि लगभग 40 प्रतिशत विवाह शादी के पहले तीन साल के भीतर ही टूट रहे हैं। और तलाक लेने वालों में अधिकतर महिलाएं 25 से 34 वर्ष के आयु वर्ग की हैं। यानी भारत की युवा पीढ़ी इस बदलाव के केंद्र में है।

क्या कहते हैं तलाक के आंकड़े?

अगर हम कारणों की बात करें तो आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करते हैं। लगभग 33 प्रतिशत मामले आपसी सहमति से हो रहे हैं। यह दर्शाता है कि कई दंपती आपसी संवाद और समझदारी के साथ अलग होने का निर्णय ले रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर 23 प्रतिशत मामलों में क्रूरता और लगभग 14.5 प्रतिशत मामलों में घरेलू हिंसा प्रमुख कारण है। यानी हर तीसरे-चौथे मामले के पीछे किसी न किसी रूप में शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न की कहानी छिपी है। लगातार झगड़े लगभग 11.5 प्रतिशत मामलों में वजह बनते हैं। व्यभिचार 6.6 प्रतिशत, परित्याग 5.4 प्रतिशत, यौन असंतोष 2 प्रतिशत से अधिक, मानसिक बीमारी, विवाह पूर्व संबंध और धार्मिक मतभेद जैसे कारण भी सामने आते हैं।

घरेलू हिंसा और क्रूरता के आंकड़े 

घरेलू हिंसा और क्रूरता के आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि तलाक सिर्फ आधुनिकता का परिणाम नहीं है, बल्कि कई बार यह आत्मरक्षा और सम्मान की लड़ाई भी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि शहरी भारत में तलाकशुदा या अलग रह रही महिलाओं का अनुपात 2017-18 की तुलना में 2023-24 तक बढ़ा है। हालांकि कुल प्रतिशत अभी भी 1 प्रतिशत से कम है, लेकिन वृद्धि की रफ्तार ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ यह भी है कि भारत अभी भी वैश्विक स्तर पर कम तलाक दर वाले देशों में है, लेकिन शहरी इलाकों में यह तस्वीर तेजी से बदल रही है।

तलाक के मामले में कौन सा राज्य सबसे आगे?

अगर राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र लगभग 18.7 प्रतिशत के साथ शीर्ष पर है। कर्नाटक 11.7 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल 8.2 प्रतिशत, दिल्ली 7.7 प्रतिशत, तमिलनाडु 7.1 प्रतिशत और तेलंगाना 6.7 प्रतिशत के आसपास हैं। राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में यह दर अपेक्षाकृत कम, लगभग 2.5 प्रतिशत बताई गई है। यह स्पष्ट करता है कि औद्योगिक और महानगरीय राज्यों में तलाक के मामलों की संख्या ज्यादा है। देश स्तर पर तुलना करें तो मालदीव 5.52 प्रतिशत के साथ काफी ऊपर है, रूस 3.9 प्रतिशत, चीन 3.2 प्रतिशत, नेपाल लगभग 2.9 प्रतिशत, अमेरिका 2.7 प्रतिशत के आसपास है, जबकि भारत करीब 0.9 प्रतिशत के स्तर पर है। यानी अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत अभी भी नीचे है, लेकिन महानगरों में तेजी से बढ़ोतरी चिंता और चर्चा दोनों का विषय है।

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तलाक को लेकर क्या कहती है 2025 की रिपोर्ट

2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, लखनऊ, हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहरों में पिछले तीन वर्षों में तलाक के मामलों में तीन गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। इसका सीधा संबंध शहरी जीवनशैली, दोहरी आय वाले परिवार, नौकरी का दबाव, लंबा कार्यकाल, ट्रांसफर, न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम और डिजिटल युग से जुड़ी अपेक्षाओं से जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स ने रिश्तों की परिभाषा और विकल्पों को भी बदल दिया है। अपेक्षाएं बढ़ी हैं, सहनशीलता घटी है और संवाद की जगह कई बार अहंकार ले लेता है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक सकारात्मक पहलू भी है। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता ने उन्हें अपने जीवन के फैसले लेने की ताकत दी है। पहले जहां आर्थिक निर्भरता के कारण महिलाएं असंतुष्ट विवाह में भी बनी रहती थीं, वहीं अब नौकरी, व्यवसाय और पेशेवर पहचान ने उन्हें विकल्प दिए हैं। पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों को बेहतर समझती हैं। वे घरेलू हिंसा अधिनियम, दहेज निषेध कानून, भरण-पोषण के अधिकार और संपत्ति में हिस्सेदारी जैसे प्रावधानों के बारे में जागरूक हैं। यह जागरूकता उन्हें चुप रहने के बजाय आवाज उठाने का साहस देती है।

पति-पत्नी के तलाक का सबसे ज्यादा असर किस रिश्ते पर?

हालांकि इसके साथ कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं। पारिवारिक ढांचे पर इसका प्रभाव पड़ता है। बच्चों की मानसिक स्थिति पर तलाक का असर गंभीर हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जिन परिवारों में लगातार झगड़े होते हैं, वहां पले-बढ़े बच्चों में असुरक्षा, अवसाद और व्यवहार संबंधी समस्याएं देखी जाती हैं। लेकिन विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि विषाक्त और हिंसक वातावरण में रहने से बेहतर है कि माता-पिता शांतिपूर्ण तरीके से अलग हो जाएं। यानी सवाल सिर्फ तलाक का नहीं, बल्कि रिश्ते की गुणवत्ता का है।

फैमिली कोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी, मई और सितंबर में तलाक याचिकाएं ज्यादा दाखिल होती हैं, जबकि त्योहारों और छुट्टियों के महीनों में अपेक्षाकृत कम। अदालतों में आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि होती है, जिसे कम करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में विशेष परिस्थितियों में इस अवधि को माफ भी किया है। आपसी सहमति वाले तलाक को विवादित मामलों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम तनावपूर्ण और अपेक्षाकृत तेज माना जाता है।

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आज के युवाओं की प्राथमिकता

आज का युवा करियर को प्राथमिकता देता है, व्यक्तिगत स्पेस को महत्व देता है और समानता की अपेक्षा करता है। विवाह में बराबरी, सम्मान और संवाद की कमी कई बार रिश्तों को कमजोर कर देती है। कामकाजी दंपतियों में समय की कमी, घरेलू जिम्मेदारियों का असमान बंटवारा और ससुराल पक्ष का हस्तक्षेप भी तनाव बढ़ाते हैं। दूसरी ओर प्रेम विवाह और अंतरजातीय विवाहों में परिवार का समर्थन न मिलना भी कई बार संबंधों को प्रभावित करता है।

यह समझना जरूरी है कि तलाक का बढ़ना सिर्फ परिवार के टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज के परिपक्व होने की प्रक्रिया भी हो सकती है। जहां पहले महिलाएं हिंसा और अपमान सहती थीं, वहीं अब वे अपने सम्मान के लिए खड़ी हो रही हैं। लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि विवाह से पहले काउंसलिंग, संवाद, भावनात्मक परिपक्वता और जिम्मेदारी की समझ विकसित की जाए। स्कूल और कॉलेज स्तर पर रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता जरूरी है। परिवारों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।

भारत अभी भी कम तलाक दर वाला देश है, लेकिन शहरी भारत में जो रुझान दिख रहा है, वह आने वाले वर्षों में सामाजिक ढांचे को नई दिशा दे सकता है। सवाल यह नहीं कि तलाक बढ़ रहे हैं, सवाल यह है कि क्या हम स्वस्थ, सम्मानजनक और समानता पर आधारित रिश्ते बना पा रहे हैं। अगर विवाह में प्रेम, विश्वास और सम्मान है तो वह मजबूत रहेगा। अगर नहीं है, तो कानून और समाज अब व्यक्ति को विकल्प दे रहे हैं।

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क्यों टूट रहे नए विवाह? जानिये कारण...

एक फैमिली कोर्ट के अध्ययन के अनुसार 40% तलाक शादी के पहले तीन साल के भीतर हो रहे हैं। यानी हनीमून पीरियड खत्म होते ही रिश्तों में दरार गहरी हो रही है। तलाक लेने वाली अधिकतर महिलाएं 25 से 34 साल की हैं। कारण क्या हैं? 23% मामलों में क्रूरता, 14.5% में घरेलू हिंसा, 11% से ज्यादा में लगातार झगड़े। यानी समस्या आधुनिकता नहीं, बल्कि व्यवहार और सम्मान की कमी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि संवाद की कमी और अवास्तविक अपेक्षाएं रिश्तों को कमजोर कर रही हैं। क्या युवा पीढ़ी विवाह के लिए भावनात्मक रूप से तैयार नहीं है? सोचिएगा जरूर।

क्यों बढ़ रहे भारत में तलाक?

भारत में तलाक के मामलों में पिछले 20 साल में 50% की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 58% मामलों में पहल महिलाएं कर रही हैं। जी हां, अब महिलाएं असंतुष्ट शादी को ढोने के बजाय कानूनी रास्ता चुन रही हैं। औसतन तलाक लेने वाली महिलाओं की उम्र 31 साल है, जबकि पुरुषों की 36 साल। इसका मतलब है कि फैसला भावनात्मक नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया जा रहा है। आर्थिक आत्मनिर्भरता, शिक्षा और कानूनी जागरूकता इस बदलाव के बड़े कारण हैं। सवाल यह है  क्या यह परिवार संस्था का कमजोर होना है, या महिलाओं का सशक्त होना? अपनी राय कमेंट में जरूर दीजिए।

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Published : 
  • 25 February 2026, 5:19 PM IST