15 अगस्त को देश जश्न मना रहा था, ये लोग जान बचाकर भाग रहे थे… 79 साल बाद भी जिंदा है मीरपुर का दर्द

15 अगस्त 1947 को जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब मीरपुर में हजारों हिंदू परिवारों के सामने जिंदगी बचाने का संकट खड़ा था। पाकिस्तानी हमले और हिंसा के बीच परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर जम्मू-कश्मीर की ओर पलायन करना पड़ा। 97 वर्षीय पुष्पा देवी आज भी उस खौफनाक दौर को याद कर सिहर उठती हैं। 79 साल बाद भी उनका परिवार मीरपुर लौटने की आस लगाए बैठा है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 14 August 2026, 4:56 PM IST

Jammu: एक तरफ देश आजादी के जश्न में डूबा था, तिरंगा आसमान में शान से लहरा रहा था और लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर स्वतंत्रता की बधाई दे रहे थे। दूसरी तरफ मीरपुर में हालात इतने भयावह थे कि हजारों लोगों के सामने जश्न मनाने के बजाय अपनी जान बचाकर भागने की मजबूरी थी। घरों में आग लगाई जा रही थी, लोग मारे जा रहे थे और परिवार बिखर रहे थे। इन्हीं हजारों लोगों में 17 साल की पुष्पा देवी भी थीं, जिनकी आंखों के सामने उनका घर-परिवार उजड़ गया।

आज 97 साल की उम्र में भी पुष्पा देवी के जेहन में 1947 की वो तस्वीरें बिल्कुल ताजा हैं। वह बताती हैं कि कैसे अपने ही घर से नंगे पैर निकलना पड़ा। बच्चों को गोद में उठाया, जानवरों को साथ लिया और कई दिनों तक पैदल चलते हुए जम्मू-कश्मीर की तरफ बढ़ते रहे। पीछे अपना घर, दुकान, रिश्तेदार और जिंदगी का पूरा संसार छूट गया।

आजादी की सुबह किसी के लिए जश्न, किसी के लिए मातम

14 अगस्त 1947 की रात और 15 अगस्त की सुबह भारत में आजादी का जश्न शुरू हुआ। जगह-जगह तिरंगा फहराया गया। प्रभातफेरियां निकलीं और लोग देशभक्ति के गीत गाते हुए सड़कों पर उतरे। लेकिन मीरपुर और आसपास के इलाकों में रहने वाले कई परिवारों के लिए वही वक्त डर और मौत का संदेश लेकर आया था। पुष्पा देवी के मुताबिक, उस समय पाकिस्तानी फौज और हमलावरों की हिंसा के बीच हिंदुस्तान के साथ रहने की इच्छा रखने वाले परिवारों को निशाना बनाया गया। उनके पिता, भाई, बहन और ससुर समेत कई रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई। घर और दुकान लूटने के बाद आग के हवाले कर दिए गए।

छह महीने के बेटे को पीछे छोड़ आई थीं पुष्पा

पलायन की कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा पुष्पा देवी आज भी नहीं भूल पातीं। वह बताती हैं कि हालात इतने खराब थे कि वह अपने छह महीने के दुधमुंहे बेटे विनोद को भी पीछे छोड़कर निकल आई थीं। उस समय जान बचाना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। पुष्पा बताती हैं कि अगले दिन उनकी सास बच्चे को गोद में लेकर पहुंचीं, तब जाकर उन्हें राहत मिली। वह पल याद करते हुए आज भी भावुक हो जाती हैं। बाकी चार बच्चों का जन्म बाद में जम्मू में हुआ।

मजदूरी करके बच्चों को पढ़ाया

पुष्पा देवी और उनके पति ने मुश्किल हालात के बावजूद बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। परिवार के बड़े बेटे विनोद ओएनजीसी में उपनिदेशक पद से रिटायर हुए। दूसरे बेटे अरुण कुमार जम्मू-कश्मीर बैंक में एजीएम रहे। बेटी प्रवीन कुमारी इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य रहीं, जबकि सुमन बाला और सरोज बाला केंद्रीय विद्यालय से सेवानिवृत्त हुईं। यानी जिस परिवार ने कभी अपना घर और जमीन खोकर शरणार्थी के रूप में जिंदगी शुरू की थी, उसी परिवार ने मेहनत और शिक्षा के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई।

बेटा बोला- मां आज भी मीरपुर जाने की जिद करती हैं

जेएंडके बैंक के एजीएम पद से रिटायर अरुण कुमार कहते हैं कि उनकी मां आज भी मीरपुर को नहीं भूली हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह अपने पुराने घर और उस जमीन को याद करती हैं, जिसे परिवार ने मजबूरी में छोड़ दिया था। अरुण के मुताबिक, बख्शीनगर में मिले आवास के बदले सरकार ने वर्ष 1970 में 4500 रुपये लिए थे। लेकिन मीरपुर में परिवार का जो मकान और दुकान लूटकर जला दिए गए, उसका मुआवजा आज तक नहीं मिला।

हजारों परिवारों ने छोड़ा था पीओके

वर्ष 1947 में पाकिस्तान की आक्रामकता और हिंसा के बाद पीओके से विस्थापित होकर भारत आए परिवारों के पुनर्वास के लिए बड़ी संख्या में लोगों ने पंजीकरण कराया था। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31,619 परिवारों ने पुनर्वास सहायता के लिए पंजीकरण कराया था। इनमें बड़ी संख्या में परिवार जम्मू संभाग में बसे। कुछ परिवार जम्मू, उधमपुर और नौशेरा के शहरी इलाकों में रहे, जबकि हजारों परिवार देश के दूसरे हिस्सों में जाकर बस गए।

केंद्र सरकार ने 1960 में विस्थापित परिवारों को अनुग्रह राशि और पुनर्वास सहायता देने का फैसला किया था। इसके बाद पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन करीब 9,500 परिवारों के मामले अलग-अलग कारणों से खारिज कर दिए गए।

किसी ने छह साल की उम्र में घर छोड़ा

पीओके से विस्थापन की कहानी सिर्फ पुष्पा देवी की नहीं है। 85 वर्षीय दौलत राम रैना भी छह साल की उम्र में अपनी मां और भाई के साथ छोटा गला, पुंछ से भारत पहुंचे थे। उनके मुताबिक परिवार ने रावलाकोट तक तीन दिन पैदल सफर किया। इस दौरान उनके ननिहाल के 18 लोगों को घर में जिंदा जला दिया गया। इसी तरह 77 वर्षीय सरदार केसर सिंह के परिवार ने भी मीरपुर चोमक से विस्थापन का दर्द झेला। हिंसा में उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए। बाद में उनका परिवार नगरोटा कैंप पहुंचा। केसर सिंह का जन्म 1949 में जम्मू में हुआ, लेकिन उनके परिवार के भीतर बंटवारे का दर्द लंबे समय तक जिंदा रहा।

79 साल बाद भी खत्म नहीं हुई वापसी की उम्मीद

पीओके विस्थापितों के अधिकारों और पुनर्वास के लिए काम कर रहे संगठन एसओएस इंटरनेशनल के अध्यक्ष राजीव चुनी लंबे समय से इन परिवारों की आवाज उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि जम्मू और आसपास के कई इलाकों में आज भी बड़ी संख्या में विस्थापित परिवार रहते हैं। आरएस पुरा, बख्शीनगर, सुचेतगढ़, रिहाड़ी, रेशमघर कॉलोनी, कृष्णा नगर, डिग्याना, मुट्ठी और भलवाल जैसे इलाकों में इन परिवारों की बस्तियां हैं। इसके अलावा राजोरी, पुंछ, कठुआ, उधमपुर, रियासी और कश्मीर के कई इलाकों में भी विस्थापित परिवार रहते हैं।

Location :  Jammu

Published :  14 August 2026, 4:55 PM IST