मोदी सरकार आगामी संसद सत्र में चंडीगढ़ से जुड़े एक विशेष विधेयक को पेश करने की तैयारी में है। पूरी खबर डाइनामाइट न्यूज़ की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में।

लोकसभा में चंडीगढ़ संबंधी विशेष विधेयक लाने की तैयारी
नई दिल्ली: एक दिसंबर से प्रारंभ हो रहे लोकसभा के सत्र में चंडीगढ़ से जुड़े एक विशेष विधेयक को पेश करने की तैयारी में केन्द्र सरकार है, जिसे लेकर पंजाब के राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी 37 पन्नों के बुलेटिन में पेज संख्या 36 पर उल्लेख है कि सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2025 पेश कर सकती है।
इस बुलेटिन में लिखा गया है कि “भारत के संविधान के अनुच्छेद 240 में केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ को शामिल करना, ताकि वह उन अन्य केंद्रशासित प्रदेशों की श्रेणी में आ सके जिनके पास विधान सभा नहीं है—जैसे अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, तथा पुडुचेरी (जब उसकी विधान सभा भंग या निलंबित हो)।”
इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद पंजाब के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि आखिर केन्द्र सरकार यह संशोधन क्यों लेकर आ रही है और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।
अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या सरकार चंडीगढ़ के लिए उपराज्यपाल (LG) की तरह एक अलग प्रशासक नियुक्त करने पर विचार कर रही है, क्योंकि वर्तमान में पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक की जिम्मेदारी संभालते हैं।
फिलहाल चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया हैं, जो पंजाब के राज्यपाल भी हैं। उन्होंने 31 जुलाई 2024 को यह पदभार ग्रहण किया था।
यह है इतिहास
1952 से 1966 तक (जब 1966 में हरियाणा का गठन हुआ), चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी था। शहर के नागरिकों का प्रतिनिधित्व पंजाब विधान सभा में होता था और स्थानीय प्रशासन का नेतृत्व एक मुख्य आयुक्त (Chief Commissioner) करते थे। उस समय, जब पंजाब अविभाजित था, चंडीगढ़ अन्य बड़े भारतीय शहरों की तरह राज्य प्रशासन की व्यापक संरचना में सुव्यवस्थित रूप से कार्य करता था लेकिन जब पंजाब का पुनर्गठन हुआ, तब पंजाब और हरियाणा—दोनों ने चंडीगढ़ को अपनी राजधानी होने का दावा किया।
इस विवाद पर अंतिम निर्णय होने तक केंद्र सरकार ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 4 के तहत (1 नवंबर 1966 से प्रभावी) चंडीगढ़ को केंद्रशासित प्रदेश (UT) घोषित कर दिया और इसका प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के अधीन कर दिया। इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, 1 नवंबर 1966 से पहले अविभाजित पंजाब में लागू सभी कानून चंडीगढ़ में लागू माने जाते हैं।
केंद्र शासित प्रदेश के रूप में प्रशासन संभालने के लिए मुख्य आयुक्त नियुक्त किए जाने की परंपरा 31 मई 1984 तक जारी रही। इसके बाद, 1 जून 1984 को पंजाब के राज्यपाल ने चंडीगढ़ के प्रशासक के रूप में प्रत्यक्ष प्रशासन का कार्यभार संभाल लिया। इसी के साथ “मुख्य आयुक्त” के पद को बदलकर “प्रशासक के सलाहकार (Adviser to the Administrator)” कर दिया गया। तब से अब तक, यानी जून 1984 से, पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक के रूप में काम कर रहे हैं।