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भारत के पहले दलित राष्ट्रपति( AI Generated image)
New Delhi: भारत के पूर्व राष्ट्रपति K.R नारायणन का जीवन संघर्ष, शिक्षा और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है, जो आज भी लाखों लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। 27 अक्टूबर 1920 को केरल के उझावूर गांव में जन्मे कोचेरिल रमन नारायणन ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया। वह भारत के 10वें राष्ट्रपति और इस पद पर पहुंचने वाले पहले दलित व्यक्ति थे। उन्होंने 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 तक राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की। गरीबी और सामाजिक भेदभाव को पीछे छोड़ देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे, भारत के पहले दलित राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल किया
के. आर. नारायणन का बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। उनके परिवार के पास सीमित साधन थे, लेकिन उन्होंने पढ़ाई के प्रति अपना लगाव कभी कम नहीं होने दिया। वह स्कूल जाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलते थे। अपनी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने त्रावणकोर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पूरी की। इसके बाद उन्हें टाटा छात्रवृत्ति मिली, जिसकी मदद से उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन किया। उनकी सफलता बताती है कि कठिन परिस्थितियां भी मजबूत इरादों को रोक नहीं सकतीं।
राजनीति और कूटनीति में आने से पहले नारायणन ने पत्रकार के रूप में भी काम किया। 1944-45 के दौरान वह ‘द हिंदू’ और ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से जुड़े रहे। वर्ष 1949 में उन्होंने भारतीय विदेश सेवा में प्रवेश किया। उन्होंने रंगून, टोक्यो, लंदन और अन्य स्थानों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह थाईलैंड, तुर्की, चीन और अमेरिका में भारत के राजदूत भी रहे।
विदेश सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद नारायणन सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। वर्ष 1984, 1989 और 1991 में वह लोकसभा के लिए चुने गए। उन्होंने केंद्र सरकार में योजना, विदेश मामलों और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे विभागों में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई। वर्ष 1992 में वह भारत के उपराष्ट्रपति बने और पांच साल बाद 1997 में राष्ट्रपति चुने गए। इस तरह उन्होंने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचकर इतिहास रचा।
नारायणन ने राष्ट्रपति पद की गरिमा और संविधान की मर्यादा को महत्व दिया। उन्हें ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाया। वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए मतदान किया। यह कदम लोकतंत्र में हर नागरिक के वोट की अहमियत का संदेश देने वाला था।
वह सामाजिक समानता, शिक्षा और वंचित वर्गों के अधिकारों के समर्थक थे। उनका मानना था कि देश की प्रगति तभी सार्थक है, जब समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों को भी आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई और शिक्षा जगत से जुड़े रहे।
राष्ट्रपति के रूप में भी निभाई अहम भूमिका( AI Generated image)
K.R नारायणन का निधन 9 नवंबर 2005 को हुआ, लेकिन उनकी उपलब्धियां आज भी याद की जाती हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा, मेहनत और आत्मविश्वास के सहारे बड़ी से बड़ी मंजिल हासिल की जा सकती है। उन्होंने अपने सफर से यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, ईमानदारी और काम से होनी चाहिए।
के. आर. नारायणन केवल भारत के राष्ट्रपति नहीं थे, बल्कि वह लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय के प्रतीक भी थे। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को सपने देखने, कठिनाइयों से लड़ने और देश के लिए योगदान देने की प्रेरणा देता रहेगा।
Location : New Delhi
Published : 27 October 2026, 10:45 AM IST