झारखंड का वो नरसंहार जिसे कहा जाता है जलियांवाला बाग, जानिये 25 साल के बिरसा मुंडा ने कैसे हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत

धरती आबा बिरसा मुंडा की कहानी सिर्फ एक क्रांतिकारी की गाथा नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान की सबसे बड़ी लड़ाई है। जानिए कैसे उलगुलान आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी, डोंबारी बुरु नरसंहार क्यों झारखंड का जलियांवाला बाग कहलाया और बिरसा मुंडा की शहादत से जुड़े अनकहे तथ्य।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 9 June 2026, 8:35 AM IST

Ranchi: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे नायक हुए, जिन्होंने अपने साहस और संघर्ष से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। उन्हीं महान योद्धाओं में एक नाम है बिरसा मुंडा का, जिन्हें आदिवासी समाज में ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता कहा जाता है। महज 25 वर्ष की आयु में उन्होंने ऐसा जनआंदोलन खड़ा किया कि ब्रिटिश साम्राज्य की नींव तक हिल गई। उनका ‘उलगुलान’ आज भी आदिवासी अस्मिता और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है।

भेड़-बकरियां चराने से शुरू हुआ संघर्ष का सफर

15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातु गांव में जन्मे बिरसा मुंडा का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। वे अपने रिश्तेदारों के यहां भेड़-बकरियां चराते और बांसुरी बजाते थे। उस दौर में उरांव, मुंडा और खड़िया आदिवासी समुदाय अंग्रेजी शासन और शोषण के बोझ तले दबे हुए थे। अपनी जमीन और जंगलों के असली मालिक होने के बावजूद आदिवासी समाज को जमींदारों, ठेकेदारों और दलालों के अत्याचार झेलने पड़ रहे थे।

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स्कूल से निकाले गए, लेकिन नहीं टूटा हौसला

बिरसा मुंडा कुछ समय के लिए चाईबासा के जर्मन स्कूल में पढ़ने गए। वहां आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का मजाक उड़ाया जाता था। बिरसा ने इसका विरोध किया, जिसके बाद धर्म प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया। यह घटना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

वैचारिक जागृति का अभियान

इसी दौरान उनकी मुलाकात स्वामी आनंद पांडे से हुई। उनके संपर्क में आने के बाद बिरसा ने अपनी संस्कृति, धर्म और महाभारत के पात्रों के बारे में गहराई से जाना। उन्होंने भारतीय धर्मग्रंथों, दर्शन और आयुर्वेद का अध्ययन किया। जंगलों में घूमकर जड़ी-बूटियां एकत्रित करना और उनसे उपचार करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। कहा जाता है कि उन्होंने औषधि विज्ञान में विशेष ज्ञान हासिल कर लिया था।

लोगों ने माना भगवान का अवतार

वर्ष 1895 के आसपास कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिनके बाद आदिवासी समाज बिरसा मुंडा को भगवान का अवतार मानने लगा। उन्होंने शोषित और पीड़ित लोगों में आत्मविश्वास और जागरूकता की नई चेतना जगाई। उन्होंने उरांव, मुंडा और खड़िया समाज के मुखियाओं को संगठित कर आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की।

उलगुलान ने अंग्रेजों की बढ़ाई चिंता

बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूंका, जिसे ‘उलगुलान’ के नाम से जाना गया। उन्होंने धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर लोगों को संगठित किया। वर्ष 1898 में डोंबारी बुरु की पहाड़ियों पर आयोजित एक विशाल सभा में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन ग्रामीणों की मदद से वे बच निकले।

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डोंबारी बुरु बना झारखंड का जलियांवाला बाग

24 दिसंबर 1899 को आंदोलन ने नया रूप लिया। आदिवासियों ने तीर-कमान से पुलिस थानों पर हमले किए। इसके बाद 9 जनवरी 1900 को डोंबारी बुरु पहाड़ी पर एकत्रित हजारों आदिवासियों को ब्रिटिश सेना ने चारों ओर से घेरकर अंधाधुंध गोलीबारी की। इस भीषण नरसंहार में सैकड़ों लोग शहीद हुए। इतिहास में यह घटना झारखंड के जलियांवाला बाग के रूप में दर्ज है।

गिरफ्तारी और रहस्यमयी मौत

गोलीकांड के बाद बिरसा मुंडा किसी तरह बच निकले, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 जून 1900 को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उन्हें जेल में विष दे दिया गया था। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनका संघर्ष और बलिदान आदिवासी समाज को प्रेरित करता रहा। आज भी धरती आबा बिरसा मुंडा स्वतंत्रता, स्वाभिमान और जनप्रतिरोध के अमर प्रतीक माने जाते हैं।

Location :  Ranchi

Published :  9 June 2026, 8:35 AM IST