कपसाड़ गांव में हुए हत्याकांड और अपहरण की घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। एक ओर जहां परिजन शोक में हैं, वहीं पुलिस की पाबंदियों ने उनके जख्म और गहरे कर दिए। मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी के बावजूद कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

कपसाड़ हत्याकांड
Meerut: गाजियाबाद से कपसाड़ गांव पहुंचीं मायादेवी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मृतका सुनीता देवी की बड़ी बहन मायादेवी ने भर्राए गले से कहा, “मेरी बहन मुझे छोड़कर चली गई। वह मेरी बेटी जैसी थी। मां के गुजर जाने के बाद मैंने ही उसे मां बनकर पाला। मैं उसके अंतिम दर्शन तक नहीं कर सकी, कम से कम अब अपनों का दुख तो बांटने दो।” लेकिन पुलिस ने मायादेवी को गांव में प्रवेश की इजाजत नहीं दी। वह बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती रहीं, मगर पुलिस अपनी पाबंदियों पर अड़ी रही।
पुलिस ने सिर्फ मायादेवी ही नहीं, बल्कि सुनीता के कई अन्य रिश्तेदारों और परिचितों को भी गांव की सीमा पर ही रोक दिया। हालात ऐसे बन गए कि शोक में डूबे परिजन अपनों तक पहुंचने के लिए पगडंडियों और खेतों के रास्तों से छिपते-छिपाते गांव में दाखिल हुए। रिश्तेदारों के अनुसार, करीब 10 से 12 लोग किसी तरह गांव तक पहुंच सके, जबकि लगभग 40 लोगों को पुलिस ने सख्ती से वापस भेज दिया।
अपनों को खोने का गम और प्रशासन की कथित बेरुखी ने ग्रामीणों और रिश्तेदारों के गुस्से को और भड़का दिया। गांव की सीमा पर ही हंगामे की स्थिति बन गई। रिश्तेदारों ने भाजपा सरकार और पुलिस प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाया। उनका कहना था कि अगर यह मामला किसी रसूखदार या प्रभावशाली समुदाय से जुड़ा होता, तो अब तक आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चल चुका होता।
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ग्रामीणों और परिजनों का आरोप है कि अनुसूचित जाति से जुड़े मामले में प्रशासन की कार्रवाई बेहद धीमी है। उनका कहना था कि घटना को कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन नामजद आरोपियों में से सभी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। इसी मुद्दे को लेकर पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की गई।
युवती रूबी के अपहरण और उसकी मां सुनीता की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर में सुनील राजपूत और दो अज्ञात युवकों को भी नामजद किया गया है। हालांकि मुख्य आरोपी पारस सोम की गिरफ्तारी के बाद भी इन तीनों की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि घटना के वक्त मौके पर सिर्फ पारस सोम और रूबी मौजूद थे।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि युवती के अपहरण और सुनीता की हत्या की साजिश में चारों युवक शामिल थे। लेकिन घटना के तीन दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस न तो सुनील राजपूत को पकड़ पाई है और न ही दो अज्ञात युवकों की पहचान कर सकी है। इससे पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि एफआईआर में नामजद सुनील और दो अज्ञात युवक क्या केवल साजिश में शामिल थे या घटना से पहले और बाद में उनकी कोई भूमिका रही। एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह का कहना है कि सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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बृहस्पतिवार सुबह सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में सुनीता देवी अपनी बेटी रूबी के साथ खेत की ओर जा रही थीं। रजबहे की पटरी के पास आरोपी पारस सोम, सुनील और उनके साथी कार लेकर पहुंचे और रूबी को अगवा करने का प्रयास किया। मां ने विरोध किया तो आरोपियों ने सुनीता पर फरसे से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल सुनीता को अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
शनिवार शाम करीब छह बजे पुलिस ने रूबी को सहारनपुर में बरामद कर लिया। आरोपी पारस सोम को भी उसके साथ गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक, दोनों रुड़की रेलवे स्टेशन से हरिद्वार भागने की फिराक में थे। देर रात करीब 10:30 बजे दोनों को मेरठ लाया गया। एसएसपी ने बताया कि प्राथमिक पूछताछ में पारस सोम ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है।