
प्रतीकात्मक छवि (Source: Pinterest)
New Delhi: दिल्ली और आसपास चलने वाली स्लीपर बसों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल सिर्फ उन आरोपियों का नहीं है, जिन पर बसों के अंदर महिलाओं और नाबालिगों के साथ यौन अपराध के आरोप लगे हैं। सवाल उस व्यवस्था का भी है, जिसमें GPS, panic button, CCTV, पर्याप्त रोशनी और ड्राइवर-कंडक्टर की जिम्मेदारी जैसे कई सुरक्षा नियम पहले से मौजूद हैं। इसके बावजूद हालिया घटनाओं ने इन नियमों की निगरानी और अमल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अगस्त 2026 में Greater Noida से दिल्ली आ रही एक स्लीपर बस में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। पुलिस जांच के मुताबिक बस करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करके Kashmere Gate पहुंची, लेकिन इस दौरान किसी पुलिस पिकेट पर उसकी जांच नहीं हुई। मामले के सामने आने के बाद बस की सुरक्षा व्यवस्था भी जांच के दायरे में आ गई।
जांच में यह भी सामने आया कि बस में CCTV काम नहीं कर रहा था और उसके खिलाफ 11 चालान लंबित थे। पुलिस यह भी जांच कर रही थी कि GPS और panic button जैसे सुरक्षा उपकरण बस में मौजूद थे या नहीं और अगर थे तो क्या वे काम कर रहे थे।
इससे पहले मई 2026 में दिल्ली के नांगलोई इलाके में एक स्लीपर बस में एक महिला से कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया था। इस मामले में जिस बस को जब्त किया गया, उसके खिलाफ दिल्ली में 36 चालान लंबित पाए गए थे। इनमें permit violation, parking, RC, speeding और अन्य नियमों से जुड़े चालान शामिल थे। पुलिस और परिवहन विभाग ने यह जांच शुरू की थी कि इतने चालानों के बावजूद बस कैसे चल रही थी।
यानी कुछ ही महीनों के अंतराल में सामने आए इन दो मामलों ने अलग-अलग सवाल खड़े किए—एक तरफ बस की निगरानी और दूसरी तरफ नियमों के उल्लंघन के बावजूद सड़क पर उसका संचालन।
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दिल्ली परिवहन विभाग की permit conditions में बसों में GPS को चालू हालत में रखना जरूरी बताया गया है। बस में पर्दे या ऐसे शीशे नहीं होने चाहिए जो अंदर का दृश्य पूरी तरह रोक दें। पर्याप्त अंदरूनी रोशनी भी अनिवार्य है। किसी महिला के साथ छेड़छाड़ या अशोभनीय व्यवहार की घटना होने पर चालक और कंडक्टर को पुलिस को सूचना देने तथा वाहन को नजदीकी पुलिस स्टेशन, पुलिस पोस्ट या PCR तक ले जाने की जिम्मेदारी दी गई है।
इसके अलावा 31 अगस्त के आदेश में दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग ने सभी बस ऑपरेटरों को functional GPS और panic buttons समेत सुरक्षा नियमों का पालन करने को कहा। पर्दों और tinted glass पर भी रोक दोहराई गई और अनधिकृत या असुरक्षित जगहों पर बस रोकने से मना किया गया।
इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सुरक्षा नियम पहले से मौजूद हैं तो उनका पालन सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या हर बस में लगे GPS और panic button की नियमित जांच होती है? खराब CCTV वाली बस सड़क पर कैसे चलती रहती है? लंबित चालानों के बावजूद किसी वाहन के permit और संचालन की स्थिति की निगरानी कैसे होती है?
दिल्ली परिवहन विभाग खुद वाहन सुरक्षा मानकों के enforcement और दूसरे राज्यों के वाहनों के permits से जुड़े काम करता है।
स्लीपर बसों में यात्रियों के सोने की व्यवस्था, पर्दे और रात में लंबी दूरी का सफर सुरक्षा निगरानी को और चुनौतीपूर्ण बना सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ बस के अंदर की सुरक्षा का नहीं, बल्कि बस में चढ़ने से लेकर गंतव्य तक monitoring chain का है।
हालिया मामलों ने यह सवाल सामने रखा है कि नियमों की सूची कितनी लंबी है, लेकिन रात में सड़क पर चल रही हर बस में उनका पालन कौन और कितनी नियमितता से जांचता है। यही वह बिंदु है जिस पर दिल्ली पुलिस, परिवहन विभाग और बस ऑपरेटरों से जवाबदेही से जुड़े सवाल पूछे जाने की जरूरत है।
Location : New Delhi
Published : 27 September 2026, 2:03 PM IST