उत्तर प्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में अमेठी और हरदोई के दो तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। अमेठी में अधिकारी पर प्रधान लिपिक से जबरन 40 हजार रुपये ट्रांसफर कराने का आरोप साबित हुआ, जबकि हरदोई में वित्तीय नियमों की अनदेखी और टेंडर प्रक्रिया का पालन न करने के आरोप सही पाए गए।

प्रतीकात्मक तस्वीर (Img: Google)
Lucknow: उत्तर प्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में कड़ा कदम उठाते हुए अमेठी और हरदोई के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। इन दोनों अधिकारियों पर जबरन वसूली और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे थे, जिनकी जांच में पुष्टि होने के बाद सरकार ने यह कार्रवाई की। इस फैसले के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है।
अमेठी के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी मनोज कुमार शुक्ला पर उनके ही कार्यालय में कार्यरत प्रधान लिपिक गोकुल प्रसाद जायसवाल ने गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के अनुसार 26 दिसंबर 2024 को शुक्ला ने लिपिक को अपने चैंबर में बुलाया और कथित रूप से उसका मोबाइल फोन छीन लिया।
आरोप है कि उन्होंने डरा-धमकाकर फोनपे का पासवर्ड हासिल किया और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए लिपिक के खाते से 40 हजार रुपये अपनी पत्नी डॉ. अंजू शुक्ला के बैंक खाते में ट्रांसफर करा लिए। शिकायत में यह भी कहा गया कि इस दौरान जातिगत टिप्पणी और अमर्यादित भाषा का भी इस्तेमाल किया गया।
रुपये मांगना पड़ा भारी! गोरखपुर में युवक को घुटने में मारी गोली, इलाके में हड़कंप
मामले की शिकायत सामने आने के बाद विभाग ने इसकी प्रारंभिक जांच कराई। जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बाद मनोज कुमार शुक्ला को निलंबित कर दिया गया और उन्हें अमेठी से हटा दिया गया था। बाद में समाज कल्याण विभाग के संयुक्त निदेशक सुनील कुमार विसेन को मामले की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई।
जांच के दौरान यह पाया गया कि प्रधान लिपिक के बैंक खाते से जबरन ऑनलाइन धनराशि ट्रांसफर कराई गई थी। हालांकि बचाव में मनोज कुमार शुक्ला ने कहा कि यह रकम उधार के रूप में ली गई थी और कई कर्मचारियों की मौजूदगी में वापस कराई गई थी। लेकिन जांच में उनके इस दावे को निराधार पाया गया।
दूसरा मामला हरदोई के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी हर्ष मवार से जुड़ा है। उनके खिलाफ आरोप था कि उन्होंने कर्मचारियों के भुगतान और अन्य कार्यों में निर्धारित टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
जांच में सामने आया कि कई कार्यों को वित्तीय नियमों के विपरीत कोटेशन के आधार पर कराया गया और खरीद संबंधी नियमों की अनदेखी की गई। जांच में इन सभी आरोपों की पुष्टि होने के बाद उनके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की सिफारिश की गई।
इन दोनों मामलों की विस्तृत जांच के बाद उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग से भी सहमति ली गई। आयोग की मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार ने दोनों अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया।