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जनपद रुद्रप्रयाग में शिक्षा विभाग की नौकरी फर्जी डिग्री पर हासिल करने वाले शिक्षक त्रिलोक सिंह कठैत को न्यायालय ने दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट
जनपद रुद्रप्रयाग में शिक्षा विभाग में बड़ा फर्जीवाड़ा
हरिद्वार: जनपद रुद्रप्रयाग में शिक्षा विभाग (Education Department) की नौकरी फर्जी बी.एड. डिग्री के आधार पर हासिल करने वाले शिक्षक त्रिलोक सिंह कठैत को न्यायालय ने दोषी करार देते हुए कड़ा दंड सुनाया है। माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अशोक कुमार सैनी (Hon'ble Chief Judicial Magistrate Shri Ashok Kumar Saini) की अदालत ने गुरुवार को दोषी त्रिलोक सिंह कठैत, पुत्र भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 एवं 471 के अंतर्गत कुल सात वर्षों की कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही कुल 15,000 रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया गया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में अभियुक्त को अतिरिक्त चार माह की सजा भुगतनी होगी।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के मुताबिक, त्रिलोक सिंह कठैत ने वर्ष 1993 की बी.एड. की फर्जी डिग्री के आधार पर शिक्षा विभाग उत्तराखंड में नौकरी प्राप्त की थी। जब इसकी जांच कराई गई तो चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (Chaudhary Charan Singh University), मेरठ से प्राप्त रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि उनके नाम पर कोई बी.एड. डिग्री जारी नहीं की गई थी। इसके आधार पर राज्य सरकार ने विशेष जांच दल (SIT) से विस्तृत जांच कराई। जांच में दोष सिद्ध होने पर शिक्षा विभाग, रुद्रप्रयाग द्वारा मुकदमा दर्ज कराया गया।
फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी सेवा में प्रवेश करना गंभीर अपराध है। अभियुक्त को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। मुकदमे की सुनवाई में सरकार की ओर से अभियोजन अधिकारी श्री प्रमोद चंद्र आर्य (Prosecution Officer Shri Pramod Chandra Arya) ने प्रभावी पैरवी की।
यह मामला न केवल शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अब राज्य सरकार व न्यायपालिका फर्जीवाड़े के मामलों में सख्ती से कार्रवाई कर रही है। फर्जी डिग्री धारकों द्वारा वर्षों तक छात्रों को शिक्षा देना न केवल नैतिक अपराध है, बल्कि यह छात्रों के भविष्य के साथ धोखा भी है।
सरकारी नौकरियों में प्रमाणपत्र सत्यापन की प्रक्रिया को और अधिक सख्त व पारदर्शी बनाए जाने की आवश्यकता है। साथ ही, ऐसी नियुक्तियों में संलिप्त अधिकारियों की भी जांच होनी चाहिए ताकि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
अदालत के इस निर्णय से एक सख्त संदेश गया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी पाने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।