रुद्रप्रयाग के जखोली में एक ही दायरे में तीन गुलदार, कैरिंग कैपेसिटी पर बड़ा सवाल; दहशत में गांव

रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लॉक में कुनियाली गांव के पास एक साथ तीन गुलदार दिखने से दहशत फैल गई है। विशेषज्ञ इसे कैरिंग कैपेसिटी के असंतुलन का संकेत मान रहे हैं। पिछले 15 महीनों में 11 हमले और तीन मौतें हो चुकी हैं।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 7 February 2026, 12:47 PM IST

Rudraprayag: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के जखोली ब्लॉक में मानव और वन्यजीव संघर्ष एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। बीती रात कुनियाली गांव में एक साथ तीन गुलदारों का दिखाई देना ग्रामीणों के लिए डर और चिंता का बड़ा कारण बन गया। यह घटना न सिर्फ स्थानीय लोगों के लिए खतरे की घंटी है, बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए भी गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।

कैरिंग कैपेसिटी का बिगड़ता गणित

विशेषज्ञों के अनुसार, एक नर गुलदार को औसतन 20 से 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जरूरत होती है। लेकिन जखोली के दक्षिणी रेंज में यह संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। खरियाल, देवल, मयाली, लम्बवाड़ और कुनियाली जैसे गांव 1 से 2 किलोमीटर की परिधि में बसे हैं, जहां सीमित जंगल क्षेत्र में गुलदारों की संख्या बढ़ती जा रही है।

जंगल से गांवों की ओर शिफ्ट हो रहे गुलदार

जब किसी क्षेत्र में गुलदारों की संख्या उनकी प्राकृतिक वहन क्षमता से अधिक हो जाती है, तो आपसी संघर्ष बढ़ता है। ऐसे में कमजोर या युवा गुलदार सुरक्षित शिकार की तलाश में गांवों की ओर रुख कर लेते हैं। गांवों की झाड़ियां, खंडहर और खेत अब उनके स्थायी ठिकाने बनते जा रहे हैं। कुनियाली में तीन गुलदारों का एक साथ दिखना इसी दबाव का संकेत है।

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डांडा की घटना ने बढ़ाया खौफ

कुनियाली से महज दो किलोमीटर दूर डांडा गांव में 30 मई 2025 को रूपा देवी की गुलदार के हमले में मौत हो चुकी है। इस घटना के बाद से पूरे क्षेत्र में डर का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि अब शाम ढलते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं और बच्चों व महिलाओं को अकेले बाहर निकलने से रोका जा रहा है।

15 महीनों में 11 हमले, तीन मौतें

पिछले 15 महीनों में जखोली क्षेत्र में गुलदारों के हमलों का आंकड़ा बेहद डरावना है। फरवरी 2024 से मई 2025 के बीच 11 बड़े हमले दर्ज किए गए, जिनमें तीन महिलाओं की जान गई। लगातार हो रहे हमलों के कारण ग्रामीण खुद को “डेथ जोन” में रहने को मजबूर महसूस कर रहे हैं।

गांवों की नजदीकी बनी गुलदारों की ढाल

मयाली, ललूड़ी, ढुमकी और आसपास के गांवों की आपसी नजदीकी गुलदारों के लिए सुरक्षित गलियारा बन गई है। एक गांव में हमला कर गुलदार आसानी से दूसरे गांव की सीमा में छिप जाते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इसी कारण गुलदारों को पकड़ना मुश्किल हो रहा है।

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प्रशासन से ठोस कार्रवाई की मांग

ग्रामीणों का कहना है कि केवल मुआवजा बांटना समाधान नहीं है। अब गुलदारों को इस क्षेत्र से शिफ्ट करना जरूरी हो गया है। वन विभाग से मांग की जा रही है कि वैज्ञानिक तरीके से गुलदारों की संख्या का आकलन किया जाए और कैरिंग कैपेसिटी से अधिक गुलदारों को सुरक्षित क्षेत्रों या रेस्क्यू सेंटर्स में भेजा जाए।

शाम ढलते ही शुरू होता है खौफ

फिलहाल कुनियाली, डांडा, चमसारी और नंदवाण के लोग भय के साए में जी रहे हैं। उनके लिए सूरज ढलना अब सुकून नहीं, बल्कि डर की शुरुआत बन चुका है।

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  • Rudraprayag

Published : 
  • 7 February 2026, 12:47 PM IST