इस बार माघ मेला केवल स्नान और आस्था तक सीमित नहीं रहा। कुछ घटनाओं और चेहरों ने ऐसा माहौल बना दिया कि हर दिन नई बहस जन्म लेती रही। कभी सत्ता के करीब दिखने वाले चेहरे चर्चा में रहे, तो कभी प्रशासन से टकराव ने सबका ध्यान खींचा। मेला अब इन्हीं सवालों के साथ समापन की ओर है।

सतुआ बाबा और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
Prayagraj: प्रयागराज के माघ मेले में आज 1 फरवरी को माघी पूर्णिमा का प्रमुख स्नान पर्व संपन्न हो रहा है। इस स्नान के साथ ही मेला अब धीरे-धीरे अपने समापन की ओर बढ़ेगा। इस पूरे माघ मेले के दौरान अगर किसी ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, तो उनमें दो नाम सबसे ऊपर रहे- संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। दोनों ही अलग-अलग कारणों से चर्चा के केंद्र में रहे और मेले की पहचान बन गए।
माघ मेले के शुरुआती चरण में सतुआ बाबा ही सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहे। इसकी दो बड़ी वजहें थीं। पहली, उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का करीबी माना जाना और दूसरी, उनके द्वारा लगातार तीन महंगी लग्जरी गाड़ियों की खरीद। साधु-संतों के सादगीपूर्ण जीवन की धारणा के बीच लग्जरी गाड़ियों का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और सतुआ बाबा चर्चाओं में छा गए।
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माघ मेले के शुरुआती दिनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रयागराज पहुंचे थे। इस दौरान वह सतुआ बाबा के शिविर में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए। मंच से संबोधन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था, “सभी लोग सतुआ बाबा से जुड़े रहें, वरना मणिकर्णिका घाट पर मिलेंगे।” मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद सतुआ बाबा का कद और चर्चाएं दोनों बढ़ गईं। इसके बाद उनके द्वारा खरीदी गई लग्जरी गाड़ियों के वीडियो ने आग में घी डालने का काम किया।
24 दिसंबर को, मेला शुरू होने से पहले ही जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा सतुआ बाबा के शिविर पहुंचे थे। यहां उन्होंने जमीन पर बैठकर तवे पर रोटी सेकते हुए तस्वीरें और वीडियो बनवाए। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। कई लोगों ने इसे प्रशासनिक प्रोटोकॉल के खिलाफ बताते हुए आलोचना भी की। इसके बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के प्रयागराज दौरे के दौरान उनका यह कहना कि "सतुआ बाबा की रोटी के चक्कर में न पड़ो," भी खूब चर्चा में रहा।
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के स्नान पर्व के बाद माघ मेले की चर्चाओं का केंद्र बदल गया। सतुआ बाबा पीछे छूट गए और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती सुर्खियों में आ गए। संगम पर पालकी से स्नान को लेकर प्रशासन और पुलिस से हुए विवाद ने उन्हें चर्चा के शिखर पर पहुंचा दिया।
मौनी अमावस्या के बाद लगातार 11 दिनों तक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ही माघ मेले की चर्चाओं का मुख्य विषय बने रहे। प्रशासन से विवाद के बाद उन्होंने अपने शिविर में प्रवेश नहीं किया और शिविर के बाहर ही बैठे रहे। श्रद्धालुओं और साधु-संतों के बीच यही सवाल गूंजता रहा कि शंकराचार्य कब स्नान करेंगे, क्या प्रशासन उनके सामने झुकेगा या मामला ऐसे ही खत्म हो जाएगा।
लगातार चर्चाओं और अटकलों के बीच शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बिना स्नान किए ही माघ मेले से काशी के लिए रवाना हो गए। उनके जाने के साथ ही मेला धीरे-धीरे शांत होने लगा।
इस बार का माघ मेला केवल स्नान और धार्मिक आयोजनों के लिए नहीं, बल्कि सतुआ बाबा और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ी चर्चाओं के लिए भी याद किया जाएगा। दोनों ही चेहरों ने अपने-अपने अंदाज में माघ मेले को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बनाए रखा।