
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Source: Pinterest )
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायतों में सरकारी धन के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी ग्राम प्रधान के कार्यकाल में सरकारी धन का नुकसान हुआ है, तो उसके पद छोड़ने के बाद भी उससे वित्तीय नुकसान की वसूली की जा सकती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि प्रशासन को ऐसी कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा के अनुसार ही करनी होगी।
यह फैसला न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने प्रयागराज के पूर्व ग्राम प्रधान शिवपूजन तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता का कार्यकाल वर्ष 2010 से 2015 तक था। पद छोड़ने के बाद उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई, जिसके आधार पर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए थे।
जांच के बाद जिला प्रोबेशन अधिकारी और जूनियर इंजीनियर की दो सदस्यीय समिति ने रिपोर्ट सौंपी, जिसके आधार पर मई 2018 में पूर्व प्रधान पर 14.84 लाख रुपये की सरचार्ज (रिकवरी) का आदेश जारी किया गया। शिवपूजन तिवारी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जांच वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 27 का विस्तृत विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि कानून पूर्व ग्राम प्रधानों को उनके कार्यकाल के दौरान हुई वित्तीय लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराने की अनुमति देता है। लेकिन जांच और रिकवरी की प्रक्रिया केवल अधिकृत अधिकारी द्वारा ही की जा सकती है।
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अदालत ने पाया कि इस मामले में जांच जिलाधिकारी द्वारा गठित सामान्य समिति से कराई गई थी, जबकि नियमों के अनुसार यह अधिकार केवल मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी (सहकारी समितियां एवं पंचायत) को है। अधिकार क्षेत्र से बाहर की गई जांच को अवैध मानते हुए हाईकोर्ट ने 14.84 लाख रुपये की रिकवरी का आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि विधिक प्रक्रिया का पालन किया जाए तो पूर्व प्रधानों से भी सरकारी धन की वसूली की जा सकती है।
Location : Prayagraj
Published : 27 July 2026, 11:42 AM IST