साल में सिर्फ एक दिन खुलता है कानपुर का रावण मंदिर, दशहरे पर होंगे दर्शन; फिर करना होगा सालभर इंतजार

कानपुर का करीब 200 साल पुराना दशानन मंदिर साल में सिर्फ विजयादशमी के दिन खुलता है। यहां रावण की प्रतिमा का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धालु बच्चों की बुद्धि, विद्या और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। दर्शन के बाद मंदिर के कपाट फिर अगले दशहरे तक बंद रहेंगे।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 19 October 2026, 3:19 PM IST
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Kanpur: कानपुर में दशहरे का नाम आते ही रावण दहन की तस्वीर सामने आने लगती है, लेकिन शहर में एक ऐसी जगह भी है जहां विजयादशमी के दिन रावण के पुतले का दहन देखने से पहले श्रद्धालु उसकी पूजा करने पहुंचते हैं। शिवाला की फूल मंडी की तंग गलियों में स्थित दशानन मंदिर अपनी इसी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां सालभर मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और श्रद्धालुओं को साल में केवल एक दिन, विजयादशमी पर दर्शन का अवसर मिलता है। इस बार भी मंदिर के पट सुबह सात बजे खोलने की तैयारी है।

दूध, दही, घी और पंचामृत से होगा अभिषेक

मंदिर में श्रद्धालुओं के पहुंचने से पहले साफ-सफाई की जाएगी। इसके बाद रावण की प्रतिमा का दूध, दही, घी, शक्कर, पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाएगा। प्रतिमा पर फूल अर्पित करने के बाद आरती होगी। पूजा की प्रक्रिया पूरी होने पर भक्तों को दर्शन करने का अवसर मिलेगा। मंदिर के पुजारी राम बाजपेई के अनुसार, साल में केवल विजयादशमी के दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इस बार सुबह सात बजे पट खोलने की तैयारी है।

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बच्चों की बुद्धि और विद्या के लिए मांगते हैं आशीर्वाद

दशानन मंदिर में पूजा की परंपराएं भी इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं और तरोई के फूल चढ़ाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से बच्चों के बल, बुद्धि, विद्या और सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद मिलता है। रावण को धार्मिक कथाओं में विद्वान पंडित और शिवभक्त के रूप में भी वर्णित किया गया है। इसी मान्यता के चलते श्रद्धालु दशहरे के दिन मंदिर पहुंचकर उसकी पूजा करते हैं। साल में केवल एक बार दर्शन होने के कारण भक्तों में इस दिन को लेकर विशेष उत्सुकता रहती है।

करीब 200 साल पुराना है मंदिर

मंदिर के पुजारी राम बाजपेई के मुताबिक, दशानन मंदिर करीब 200 साल पुराना है। इसकी देखरेख श्याम बाजपेई ट्रस्ट करता आ रहा है। मंदिर की सालाना परंपरा के अनुसार, विजयादशमी के दिन कपाट खोलकर पूजा-अर्चना की जाती है और दर्शन के बाद फिर बंद कर दिए जाते हैं। इस मंदिर में रावण की पूजा के साथ उसके अहंकार के अंत का संदेश भी जुड़ा हुआ है। पुजारी के अनुसार, रावण का जन्मदिन भी यहां मनाया जाता है। धार्मिक परंपरा में रावण को विद्वान माना गया है, लेकिन उसका अहंकार उसके पतन का कारण बना।

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रावण पूजा के साथ अहंकार छोड़ने का संदेश

दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। कानपुर के दशानन मंदिर में रावण की पूजा और शहर में रावण दहन की परंपरा एक ही दिन अलग-अलग संदेश सामने रखती हैं। मंदिर में श्रद्धालु रावण के विद्वान रूप को याद करते हैं, जबकि रावण दहन उसके अहंकार और बुराइयों के अंत की सीख देता है।

Location :  Kanpur

Published :  19 October 2026, 3:19 PM IST

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