
घूंघट में अखाड़े में उतरीं महिला (IMG: AI Generated)
Hamirpur: आमतौर पर आपने अखाड़े में पुरुष पहलवानों को दांव-पेच आजमाते देखा होगा, लेकिन यूपी के हमीरपुर में रक्षाबंधन के दूसरे दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यहां कजली पर्व पर गांव की बहू-बेटियां घूंघट की आड़ में अखाड़े में उतरीं और देखते ही देखते कुश्ती का रोमांच शुरू हो गया। किसी ने सामने वाली पहलवान को पटखनी दी तो किसी ने दांव लगाकर उसे चित्त कर दिया।
हमीरपुर के मुस्करा विकासखंड स्थित लोदीपुर निवादा गांव में शनिवार को आयोजित इस पारंपरिक महिला दंगल को देखने के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां पहुंचीं। ढोल और थाप की आवाज के बीच महिला पहलवानों का हौसला बढ़ाया गया। इस पूरे आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि अखाड़े और उसके आसपास पुरुषों की एंट्री पूरी तरह रोक दी गई थी।
दंगल में गांव की महिलाएं पारंपरिक साड़ी पहनकर और घूंघट डालकर अखाड़े में पहुंचीं। इसके बाद शुरू हुए कुश्ती के मुकाबलों में महिलाओं ने पूरे आत्मविश्वास के साथ एक-दूसरे को चुनौती दी। मालती शुक्ला ने माया गुप्ता को पटखनी देकर मुकाबला अपने नाम किया। कौशिल्या ने मुलिया को गिराया, जबकि रामसखी ने शकुंतला को चित्त कर दिया। संपत सविता और श्यामा पाल के बीच हुए मुकाबले में संपत सविता विजयी रहीं।
इसी तरह विद्या सविता और मोहनी के बीच भी जोरदार मुकाबला देखने को मिला, जिसमें विद्या ने जीत दर्ज की। वहीं रानी भुर्जी ने मीरा सविता को हराकर अपना मुकाबला जीत लिया।
इस महिला दंगल की सबसे अनोखी बात इसकी व्यवस्था है। दंगल के दौरान अखाड़े के आसपास पुरुषों के आने पर पूरी तरह रोक रहती है। गांव के पुरुष या तो अपने घरों में रहते हैं या फिर आयोजन के समय गांव से बाहर चले जाते हैं। कुश्ती के मुकाबलों से लेकर दर्शकों की व्यवस्था तक की जिम्मेदारी महिलाएं ही संभालती हैं। यही वजह है कि यह दंगल सामान्य कुश्ती प्रतियोगिताओं से बिल्कुल अलग नजर आता है।
ग्रामीणों के मुताबिक, इस दंगल की परंपरा अंग्रेजों के शासनकाल से जुड़ी हुई बताई जाती है। गांव के बुजुर्गों के बीच प्रचलित लोककथा के अनुसार उस दौर में जब गांव के पुरुष अंग्रेजी शासन के अत्याचार से बचने के लिए इधर-उधर चले जाते थे, तब महिलाओं ने अपनी सुरक्षा के लिए कुश्ती और आत्मरक्षा के दांव-पेच सीखना शुरू किया था। समय के साथ हालात बदल गए, लेकिन महिलाओं का अखाड़े में उतरना बंद नहीं हुआ। यही परंपरा धीरे-धीरे कजली पर्व से जुड़ती चली गई।
बुंदेलखंड के लोकजीवन में कजली पर्व का खास महत्व माना जाता है। रक्षाबंधन के बाद होने वाले इस पर्व से गीत-संगीत, मेलों और पारंपरिक आयोजनों की परंपरा जुड़ी रही है। लोदीपुर निवादा में महिला दंगल भी इसी लोकपरंपरा का हिस्सा माना जाता है। हर साल कजली पर्व पर महिलाएं इस आयोजन के लिए जुटती हैं। उनके लिए यह केवल कुश्ती का मुकाबला नहीं होता, बल्कि एक साथ मिलने-जुलने और अपनी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर भी होता है।
गांव के लोगों का कहना है कि इस दंगल में जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण परंपरा को जिंदा रखना है। बुजुर्ग महिलाओं के लिए यह आयोजन पुरानी यादों और संस्कृति से जुड़ा हुआ है, जबकि युवा पीढ़ी के लिए यह अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच बन चुका है। अखाड़े में घूंघट डालकर उतरने वाली महिलाओं की तस्वीर एक तरफ बुंदेलखंड की पारंपरिक संस्कृति की झलक दिखाती है, तो दूसरी तरफ यह नारी शक्ति और आत्मविश्वास का भी प्रतीक बनती है।
प्रतियोगिता के समापन के बाद विजेता और उपविजेता महिलाओं को सम्मानित किया गया। ग्राम प्रधान गिरिजा देवी ने विजेताओं को नकद पुरस्कार और उपहार देकर उनका उत्साह बढ़ाया। दंगल में रेफरी की भूमिका अभिलाषा गुप्ता और पूजा गुप्ता ने निभाई। आयोजन में महिलाओं ने ही अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं और पूरी प्रतियोगिता को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराया।
लोदीपुर निवादा का यह महिला दंगल सिर्फ कुश्ती प्रतियोगिता नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति का एक अनोखा हिस्सा बन चुका है। यहां घूंघट में अखाड़े में उतरती बहू-बेटियां, ढोल की थाप पर उनका हौसला बढ़ाती महिलाएं और पुरुषों की आयोजन से दूरी इस परंपरा को खास बनाती है। बदलते समय के बावजूद गांव ने अपनी इस पुरानी परंपरा को संभालकर रखा है। कजली पर्व पर होने वाला यह दंगल अब गांव की पहचान बन चुका है। हर साल महिलाएं अखाड़े में उतरती हैं और नई पीढ़ी को बताती हैं कि परंपराएं सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, उन्हें जिंदा भी रखा जा सकता है।
Location : Hamirpur
Published : 30 August 2026, 6:57 PM IST