गोरखपुर की पहचान बन चुके रामगढ़ताल (नौका विहार क्षेत्र) में इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय संकट के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। झील में बड़ी संख्या में मछलियों की अचानक मौत ने न सिर्फ स्थानीय लोगों बल्कि पर्यावरण विशेषज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है।

Gorakhpur: गोरखपुर की पहचान बन चुके रामगढ़ताल (नौका विहार क्षेत्र) में इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय संकट के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। झील में बड़ी संख्या में मछलियों की अचानक मौत ने न सिर्फ स्थानीय लोगों बल्कि पर्यावरण विशेषज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है। बहाव के साथ मरी हुई मछलियां झील के किनारों पर जमा हो गई हैं, जो सड़ने लगी हैं। इसके चलते आसपास के इलाकों में तेज दुर्गंध फैल गई है और लोगों का झील के किनारे आना-जाना मुश्किल हो गया है।
जानकारों के अनुसार झील के पानी में बढ़ती गंदगी, घरेलू अपशिष्ट और पोषक तत्वों की अधिकता ने हालात को बिगाड़ दिया है। पानी में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ने से शैवाल (एल्गी) तेजी से फैल रही है। यही शैवाल रात के समय पानी में मौजूद घुलित ऑक्सीजन को तेजी से खत्म कर देती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों का दम घुटने लगता है। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत हो रही है।
सूचना मिलने पर हेरिटेज फाउंडेशन से जुड़े पर्यावरण विशेषज्ञ मनीष चौबे और आशीष कुमार ने मौके का निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि झील के जल में जैविक प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक जलीय जीवों के लिए पानी में कम से कम 4 मिलीग्राम प्रति लीटर घुलित ऑक्सीजन जरूरी होती है, जबकि मौजूदा हालात में यह स्तर काफी नीचे चला गया है।
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स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि शहर के कई हिस्सों का गंदा नाला, प्लास्टिक कचरा और पूजा-सामग्री बिना किसी ठोस व्यवस्था के झील में पहुंच रही है। इससे जल की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। बीते कुछ दिनों से झील का रंग बदला हुआ दिख रहा था और बदबू भी बढ़ रही थी, लेकिन समय रहते ध्यान नहीं दिया गया।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द प्रदूषण नियंत्रण और वैज्ञानिक तरीके से जल शुद्धिकरण नहीं किया गया, तो रामगढ़ताल का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ सकता है। गर्मी बढ़ने के साथ स्थिति और भयावह हो सकती है।
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फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन स्थानीय लोगों और पर्यावरण संगठनों ने नगर निगम, झील प्रबंधन प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। मरी हुई मछलियों के सुरक्षित निस्तारण, प्रदूषण स्रोतों की पहचान और नियमित जल गुणवत्ता जांच को अब टालना भारी पड़ सकता है।