
बलरामपुर जिला चिकित्सालय (सोर्स- डीएन रिपोर्टर)
Balrampur: उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में इंसानी खून के अवैध कारोबार का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। संयुक्त जिला चिकित्सालय में बड़े स्तर पर सक्रिय इस गिरोह के खिलाफ मुख्य चिकित्सा अधिकारी की जांच रिपोर्ट के बाद प्रशासन ने कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सालय के सीएमएस डॉ राज कुमार ने ब्लड बैंक में तैनात संविदा लैब टेक्नीशियन अभिषेक सिंह की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की संस्तुति उच्चाधिकारियों को भेज दी है।
इसके साथ ही, सरकारी ब्लड बैंक की मुख्य पैथोलॉजिस्ट डॉ आकांक्षा शुक्ला की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में बेहद संदिग्ध पाई गई है, जिसके चलते उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया है। दरअसल, प्रशासन द्वारा हाल ही में सील किया गया निजी 'केके चैरिटेबल ब्लड सेंटर' इसी पैथोलॉजिस्ट की मेडिकल डिग्री के आधार पर संचालित किया जा रहा था, जिससे इस बात को बल मिलता है कि सरकारी तंत्र की मिलीभगत से ही इस पूरे गोरखधंधे को अंजाम दिया जा रहा था। आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े कई रसूखदार लोगों पर कानून का शिकंजा और कसना तय माना जा रहा है।
इस संगठित गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बलरामपुर तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरे देवीपाटन मंडल में पैर पसार चुका था। निजी ब्लड बैंक को सरकारी रक्त कोष से सीधे तौर पर मदद पहुंचाई जा रही थी, जिसमें बलरामपुर जिला अस्पताल के लैब टेक्नीशियन अभिषेक सिंह और श्रावस्ती के ब्लड बैंक में तैनात कर्मचारी सौरभ श्रीवास्तव मुख्य भूमिका में थे। ये दोनों मिलकर सरकारी खून को अवैध रूप से निजी क्षेत्र में खपा रहे थे, जिन्हें पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज चुकी है। इस पूरे सिंडिकेट को आर्थिक संरक्षण देने का काम गोंडा के पडरीकृपाल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात एक रसूखदार लिपिक जगदीश सिंह कर रहा था।
यह लिपिक पूर्व में बलरामपुर और लखीमपुर में भी तैनात रह चुका है। गिरफ्तार आरोपी अभिषेक सिंह इसी लिपिक का बेटा है। जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इस क्लर्क ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने बेटे, बेटी और दामाद समेत कई सगे-संबंधियों को सरकारी अस्पतालों में नियुक्त करवा रखा था, जिसकी फाइल विजिलेंस विभाग ने पहले ही खोल दी है।
संविदा पर तैनात होने के बावजूद अभिषेक सिंह का सरकारी ब्लड बैंक पर पूरा नियंत्रण था। वह जब चाहता, तब बिना किसी रोक-टोक के सरकारी खून को अपनी निजी संस्था में ट्रांसफर कर देता था और वहां इसे मनमाने दामों पर बेचा जाता था। बदले में अस्पताल के कई जिम्मेदार अधिकारी और डॉक्टर मोटा कमीशन लेकर पूरी तरह खामोश रहते थे।
इस अवैध कारोबार से इतनी अकूत संपत्ति अर्जित की गई कि लिपिक जगदीश सिंह ने हाल ही में गोंडा जिले में इसी नाम से एक और नया ब्लड बैंक खोल लिया था, जो अब प्रशासन के रडार पर है। सीएमएस ने स्पष्ट किया है कि यदि आरोपियों की तरफ से संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उनके खिलाफ कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
जांच दल को इस गिरोह की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार कई चौंकाने वाले सबूत मिल रहे हैं, जिससे यह साफ हो गया है कि यह कोई छिटपुट घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत चलाया जा रहा सिंडिकेट था। यह नेटवर्क तीमारदारों और लाचार मरीजों की लाचारी का फायदा उठाकर उनसे खून के बदले भारी-भरकम रकम वसूलता था। इसके लिए सरकारी ब्लड डोनर कार्ड्स, ड्यूटी रजिस्टरों और खून के संग्रह से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया जाता था। यही वजह है कि जांच टीम अब सरकारी और निजी ब्लड बैंकों के पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड खंगाल रही है, जिसमें लगातार बड़ी वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं उजागर हो रही हैं।
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इस बड़े खुलासे के बाद से आम जनता और मरीजों के परिजनों में गहरा रोष और असुरक्षा का माहौल है। लोगों का सवाल है कि इतनी संवेदनशील जगह पर इतना बड़ा नेटवर्क इतने समय से कैसे फल-फूल रहा था और पुलिस की शुरुआती मुस्तैदी के बाद स्वास्थ्य विभाग अब भी ठोस कदम उठाने में ढिलाई क्यों बरत रहा है। वहीं दूसरी तरफ, इस पूरे खेल में शामिल केके चैरिटेबल ट्रस्ट के अन्य सदस्यों में भी हड़कंप मचा हुआ है, क्योंकि जेल जा चुके आरोपी सौरभ श्रीवास्तव की मां और पत्नी इस ट्रस्ट में सीधे तौर पर शामिल हैं।
मामले पर आधिकारिक रुख स्पष्ट करते हुए बलरामपुर के एसीएमओ और मुख्य जांच अधिकारी डॉ संतोष श्रीवास्तव ने बताया कि निजी और सरकारी क्षेत्र के सभी संदिग्ध कर्मियों की भूमिका की गहनता से पड़ताल की जा रही है और जल्द ही एलटी की बर्खास्तगी के साथ-साथ पैथोलॉजिस्ट की भूमिका पर भी अंतिम फैसला ले लिया जाएगा।
Location : Balrampur
Published : 16 July 2026, 10:30 AM IST