सिस्टम की सुस्ती या प्रशासनिक नाकामी? देखिये लंबित मुकदमों पर क्या बोला हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों के लिए सरकार और पुलिस की कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया। कोर्ट ने 'तारीख पर तारीख' टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस की लापरवाही, कर्मचारियों की कमी और फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित कर रही है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 12 May 2026, 9:26 AM IST

Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालतों में लंबित मामलों और न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने प्रसिद्ध फिल्म दामिनी के चर्चित संवाद 'तारीख पर तारीख' का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तक सरकार और पुलिस की कार्यशैली में सुधार नहीं होगा, तब तक अदालतों पर लगा यह दाग नहीं मिटेगा।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत ने आगरा निवासी मेवालाल की जमानत अर्जी खारिज करते समय की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में मौजूद कई गंभीर प्रशासनिक खामियों की ओर ध्यान दिलाया।

अदालतों में कर्मचारियों की भारी कमी

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में पेशकार, आशुलिपिक और अन्य अनुसचिवीय कर्मचारियों की भारी कमी है। स्थिति यह है कि एक-एक लिपिक के पास हजारों फाइलों का बोझ है, जिससे मामलों के निस्तारण में देरी होना स्वाभाविक है। कोर्ट ने माना कि न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते मुकदमों का दबाव केवल न्यायाधीशों की वजह से नहीं, बल्कि प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण भी है।

पुलिस की लापरवाही से बढ़ रही देरी

कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि पुलिस समय पर समन और वारंट तामील कराने में विफल रहती है। इसके अलावा गवाहों और पुलिस अधिकारियों की अदालत में अनुपस्थिति भी मुकदमों में देरी का बड़ा कारण बन रही है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब तक पुलिस अभियुक्तों और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं करेगी, तब तक न्यायाधीश समय पर फैसला नहीं दे सकते।

जिला पुलिस प्रमुखों की मौजूदगी अनिवार्य

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जिला पुलिस प्रमुखों और पुलिस कमिश्नरों को जिला जज की अध्यक्षता में होने वाली मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। कोर्ट ने कहा कि इन बैठकों में अनुपस्थिति न्यायिक प्रोटोकॉल का अपमान है और इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।

फॉरेंसिक लैब की स्थिति पर चिंता

कोर्ट ने प्रदेश की फॉरेंसिक लैब की स्थिति को भी दयनीय बताया। अदालत के अनुसार आधुनिक मशीनों और पर्याप्त स्टाफ की कमी के कारण फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में लंबा समय लगता है, जिससे मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है। हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि यूपी की फॉरेंसिक लैब को पुलिस विभाग से अलग कर गृह मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त विभाग बनाया जाए, ताकि वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से स्वतंत्र होकर बेहतर ढंग से कार्य कर सकें।

Location :  Prayagraj

Published :  12 May 2026, 9:26 AM IST