
कामकाजी माता-पिता के लिए हाई कोर्ट का बड़ा फैसला (Img: Pinterest)
Allahabad: नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण और कस्टडी के मामले में एक अहम बात कहते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कामकाजी मां अपनी आर्थिक क्षमता के आधार पर बच्चे की कस्टडी हासिल करती है, तो बाद में बच्चे के पालन-पोषण का पूरा आर्थिक बोझ सिर्फ पिता पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि जब माता-पिता दोनों कमा रहे हों, तो बच्चे की पढ़ाई, सेहत और दूसरी जरूरतों का खर्च उनकी अपनी-अपनी कमाई के अनुपात में बांटा जाना चाहिए।
यह बात जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की सिंगल-जज बेंच ने मां और उसकी नाबालिग बेटी की तरफ़ से दायर क्रिमिनल रिविजन याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। प्रयागराज की फैमिली कोर्ट ने मां की अंतरिम भरण-पोषण की अर्ज़ी खारिज कर दी थी, हालांकि उसने बच्चे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण तय किया था। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
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सुनवाई के दौरान, मां ने दावा किया कि वह अपनी आजीविका नहीं कमा पा रही थी और पति के दबाव के कारण उसे अपनी पिछली कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी छोड़नी पड़ी थी। इसके उलट, पति ने सैलरी स्लिप पेश करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी हर महीने 14,125 रुपये कमा रही थी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पत्नी रजनीश बनाम नेहा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक दायर हलफनामे में अपनी आय और नौकरी के बारे में पूरी जानकारी देने में नाकाम रही थी।
रिकॉर्ड के मुताबिक, बच्चा शुरू में पिता के साथ रह रहा था और वही खर्च उठा रहे थे। बाद में, मां ने हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर करके कस्टडी हासिल कर ली, यह दावा करते हुए कि वह खुद का और अपनी बेटी का खर्च उठाने में सक्षम है। इसे देखते हुए, कोर्ट ने कहा कि कस्टडी मिलने के बाद पिता पर पूरा आर्थिक बोझ डालना गलत होगा।
इस बीच, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ के एक जोड़े से जुड़े कस्टडी विवाद में एक बहुत भावुक फैसला सुनाया। दोनों बच्चों के भले को प्राथमिकता देते हुए, जस्टिस संदीप जैन की कोर्ट ने उनकी कस्टडी अलग-अलग माता-पिता को सौंप दी। लगभग दो घंटे तक चली सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने शुरू में जोड़े को सुलह करने और साथ रहने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे।
बातचीत के दौरान, बेटे ने पहले तो अपने पिता के साथ रहने की इच्छा जताई, लेकिन अपनी माँ की मौजूदगी में उसने दोनों माता-पिता के साथ रहने की बात कही। इस बीच, ढाई साल की बेटी जो पिछले तीन महीनों से अपने पिता के साथ रह रही थी कोर्टरूम में अपनी मां से लिपटकर रोने लगी। इस भावुक दृश्य के बाद, कोर्ट ने आदेश दिया कि बेटी की कस्टडी मां को सौंप दी जाए, जबकि बेटा पिता की कस्टडी में रहेगा। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कस्टडी से जुड़े किसी भी विवाद में बच्चों का हित ही सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।
Location : Allahabad
Published : 17 July 2026, 1:14 PM IST