पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक राजनीति को झकझोर दिया है। टारगेटेड स्ट्राइक, खामेनेई की कथित हत्या और रूस-चीन की प्रतिक्रियाओं के बीच हालात बेहद संवेदनशील हो गए हैं। दुनिया की नजरें अब कूटनीतिक समाधान पर टिकी हैं।

ईरान पर टारगेटेड स्ट्राइक के बाद दुनिया सतर्क (फोटो सोर्स- डाइनामाइट न्यूज़)
New Delhi: पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति को हिला दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका- इजराइल बनाम ईरान टकराव अब ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां से हालात व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकते हैं। यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था, ऊर्जा राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और महाशक्तियों की रणनीति की जटिल कहानी बन चुका है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने अपने चर्चित शो The MTA Speaks में अमेरिका-इजराइल और ईरान में टकराव कैसे शुरू हुआ, अब तक क्या-क्या हुआ, और आगे क्या हो सकता है? को लेकर विश्लेषण किया।
घटनाक्रम की पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। पिछले कुछ महीनों से क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा था। इजराइल और ईरान के बीच छाया युद्ध, साइबर हमले, प्रॉक्सी संगठनों के जरिए टकराव और सीरिया-लेबनान क्षेत्र में हमले लगातार जारी थे। अमेरिका पहले से ही इजराइल का रणनीतिक सहयोगी रहा है। हाल के दिनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर बयानबाज़ी तेज हुई। इसी बीच अचानक संयुक्त सैन्य कार्रवाई की खबर आई। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के भीतर उच्च-स्तरीय टारगेटेड स्ट्राइक की। इन हमलों का लक्ष्य ईरान की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व संरचना थी।
सबसे बड़ी खबर यह सामने आई कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की उनके परिवार के कुछ सदस्यों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ हत्या कर दी गई। यह दावा सामने आते ही पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई। इज़राइल ने दावा किया कि ऑपरेशन के दौरान एक ही मिनट में 40 ईरानी कमांडर मारे गए। यदि यह आंकड़ा सही है तो यह ईरान की सैन्य संरचना पर अब तक का सबसे बड़ा झटका है। हालांकि स्वतंत्र पुष्टि सीमित है और सूचना युद्ध अपने चरम पर है। ईरान ने शुरुआत में आधिकारिक चुप्पी साधी, फिर इसे आक्रामक युद्ध की कार्रवाई बताया।
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin ने इस कथित हत्या को अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता का उल्लंघन करार दिया। उनका बयान यह संकेत देता है कि यह टकराव केवल दो या तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का हिस्सा बन सकता है। चीन ने भी संयम की अपील की और संयुक्त राष्ट्र में आपात चर्चा की मांग की। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने तत्काल युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान का आग्रह किया।
ईरान ने खुली चेतावनी दी कि वह दुनिया के किसी भी कोने में अमेरिकी हितों को निशाना बनाएगा। इसके तुरंत बाद मिसाइलों और ड्रोन के जरिए जवाबी हमले शुरू हुए। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी और इज़राइली ठिकानों को लक्ष्य बनाया गया। कई सैन्य अड्डों, रडार स्टेशनों और लॉजिस्टिक सप्लाई लाइनों पर हमलों की सूचना आई। पूरे मिडिल ईस्ट में हाई अलर्ट घोषित किया गया। कई देशों ने अपना एयरस्पेस बंद किया। अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द होने लगीं। दिल्ली एयरपोर्ट से भी 100 से अधिक उड़ानें प्रभावित हुईं क्योंकि पश्चिम एशिया के ऊपर से गुजरने वाले रूट अस्थायी रूप से टाल दिए गए।
इसी बीच कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर भीड़ के हमले और फायरिंग में मौतों की खबर ने संकेत दिया कि जनभावनाएं भड़क रही हैं। खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा है, वहां तनाव बढ़ गया है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो तेल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल संभव है।
खामेनेई की कथित मौत के बाद अराफी द्वारा ईरान की कमान संभालने की खबर आई, लेकिन सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यदि शीर्ष नेतृत्व में स्थायी बदलाव होता है तो ईरान की विदेश नीति और सैन्य रणनीति में आक्रामकता बढ़ सकती है। इज़राइल और अमेरिका ने संकेत दिया है कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निष्क्रिय करने के लिए कार्रवाई कर रहे थे। वहीं ईरान इसे संप्रभुता पर सीधा हमला बता रहा है।
आर्थिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट और अस्थिरता देखी गई। शिपिंग बीमा प्रीमियम बढ़े। एयरलाइंस को लंबा मार्ग अपनाना पड़ा, जिससे लागत बढ़ी। यदि संघर्ष लंबा चलता है तो वैश्विक मंदी का खतरा बढ़ सकता है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए यह चिंता का विषय है।
अब भारत की राजनीति की बात। विपक्ष के बड़े नेताओं ने सरकार से स्पष्ट रुख की मांग की है। अखिलेश यादव ने कहा कि भारत सरकार बताए कि वह जंग के साथ है या अमन के। युद्ध में मारे जाने वालों की खबरों की पुष्टि की जाए और सच्चाई जनता के सामने रखी जाए। उनका कहना है कि सूचना के इस दौर में पारदर्शिता अनिवार्य है। दूसरी ओर Priyanka Gandhi ने कहा कि सरकार, जिसने Benjamin Netanyahu और Donald Trump के सामने झुकने का आरोप झेला है, अब युद्ध-प्रभावित देशों में फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करे।
भारत के सामने बहुस्तरीय चुनौती है। पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय कामगार और पेशेवर हैं। उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अतीत में भारत ने सफल निकासी अभियान चलाए हैं, और आवश्यकता पड़ने पर फिर से वैसी तैयारी करनी होगी। दूसरी ओर भारत के रणनीतिक संबंध अमेरिका और इज़राइल से हैं, वहीं ऊर्जा निर्भरता और क्षेत्रीय संतुलन की आवश्यकता ईरान और खाड़ी देशों से संबंध बनाए रखने को मजबूर करती है। ऐसे में संतुलन साधना कठिन होगा।
आगे क्या हो सकता है? पहला परिदृश्य- सीमित युद्ध, जहां जवाबी कार्रवाई के बाद कूटनीतिक हस्तक्षेप से तनाव कम हो जाए। दूसरा परिदृश्य- खाड़ी देशों की सीधी भागीदारी और संघर्ष का विस्तार। तीसरा- प्रॉक्सी संगठनों के जरिए बहु-क्षेत्रीय टकराव। चौथा- समुद्री मार्गों और साइबर स्पेस में व्यापक संघर्ष। यदि संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख शक्तियां सक्रिय कूटनीति नहीं अपनातीं तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में एक चिंगारी वैश्विक संकट का रूप ले सकती है। 1973 के तेल संकट से लेकर हालिया संघर्षों तक, ऊर्जा और भू-राजनीति का रिश्ता गहरा रहा है। आज भी वही खतरा मंडरा रहा है। भारत को अपने राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और वैश्विक छवि- इन सभी पहलुओं पर समन्वित रणनीति बनानी होगी।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हर युद्ध में आम नागरिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। शहरों में सायरन बजते हैं, बाजार बंद होते हैं, स्कूल खाली होते हैं और परिवार असुरक्षा में जीते हैं। यही कारण है कि दुनिया को इस समय और युद्ध नहीं, बल्कि संवाद और संयम की आवश्यकता है।