
नई दिल्ली: 1 अप्रैल 2025 से शुरू होने वाले नए वित्तीय वर्ष के साथ विभिन्न क्षेत्रों में कई नए नियम लागू हो रहे हैं, जिनका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। केंद्र सरकार ने हाल ही में आवश्यक दवाओं की कीमतों में 1.74% तक की बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है, जिससे मौसमी बुखार, एलर्जी, डायबिटीज और अन्य आम बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाओं के भाव बढ़ेंगे।
दवाओं में निर्धारित बढ़ोतरी
मंजूरी और निर्धारण: नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन में शामिल दवाओं की कीमतें होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में 1.74% की वृद्धि के आधार पर बढ़ाई जाएंगी। इसमें पेरासिटामोल, एज़िथ्रोमाइसिन, एंटी-एलर्जी, एंटी-एनीमिया और विटामिन एवं मिनरल्स की दवाएं शामिल हैं।
कच्चे माल की महंगाई: दवा कंपनियों का कहना है कि पिछले कुछ समय से कच्चे माल की कीमतों में आई वृद्धि के कारण उत्पादन लागत में भी इजाफा हुआ है। इसी कारण उन्होंने कीमतें बढ़ाने की मांग की थी, जिसे सरकार ने मुद्रास्फीति आधारित मूल्य संशोधन के तहत मंजूरी दे दी है।
नियमित संशोधन: नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी के अधिकारियों का कहना है कि हर साल जरूरी दवाओं की कीमतों में संशोधन किया जाता है। इस वर्ष थोक मूल्य सूचकांक में वृद्धि के चलते यह बढ़ोतरी अनिवार्य हो गई है।
आम आदमी और फार्मा कंपनियों की प्रतिक्रिया
सरकारी कर्मचारियों से लेकर आम नागरिक तक, दवाओं की कीमतों में मामूली वृद्धि का सीधा असर देखा जाएगा। वहीं, फार्मा कंपनियों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि कच्चे माल की बढ़ती लागत के मद्देनज़र यह कदम उचित है।
नया वित्तीय वर्ष नए नियमों के साथ आते ही आवश्यक दवाओं की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी को अनिवार्य कर देगा। यह कदम मुद्रास्फीति के दबाव के बीच दवा कंपनियों और सरकार के बीच संतुलन बनाने की दिशा में उठाया गया एक आवश्यक निर्णय बताया जा सकता है।
Published : 28 March 2025, 6:44 PM IST
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