महात्मा गांधी की पुस्तक ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी’ दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली आत्मकथा है। गुजराती में धारावाहिक रूप से शुरू हुई यह कृति आज 50 से अधिक भाषाओं में अनूदित होकर 1 करोड़ से ज्यादा पाठकों तक पहुँच चुकी है। पढिए क्या है पुस्तक का इतिहास और इसमें लिखी जरूरी बातें…

महात्मा गांधी की पुस्तक ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी’ (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
New Delhi: महात्मा गांधी ने अपनी इस पुस्तक को लिखने का कार्य 1925 में शुरू किया। तब उनके एक करीबी मित्र ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी।मित्र ने कहा था- "आत्मकथा लिखना पश्चिम की परंपरा है।"
लेकिन गांधी ने सत्य के साथ अपने प्रयोगों की कहानी लिखने का फैसला किया। आज, ठीक 100 साल बाद, वही किताब- 'सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी' दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली आत्मकथाओं में शामिल हो चुकी है। इसकी 1 करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा को किसी पारंपरिक आत्मकथा की तरह नहीं, बल्कि सत्य के साथ अपने जीवन-प्रयोगों की कथा के रूप में लिखा। यह आत्मकथा सबसे पहले गुजराती भाषा में 'सत्य ना प्रयोगो अथवा आत्मकथा' शीर्षक से नवजीवन पत्रिका में 29 नवंबर 1925 को धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई। इसकाअंतिम अध्याय 3 फरवरी 1929 को छपा। साथ ही, इसका अंग्रेजी अनुवाद यंग इंडिया पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जिससे गांधी की जीवन-कथा विश्व तक पहुँची।
गांधी जी की आत्मकथा के अधिकतर अंग्रेजी अनुवाद उनके सचिव महादेव देसाई ने किए। हालांकि, बारडोली सत्याग्रह (1928-29) की जांच के दौरान महादेव देसाई की अनुपस्थिति में अध्याय 29 से 43 का अनुवाद प्यारेलाल नैयर ने किया। बाद में यह आत्मकथा दो खंडों में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई- पहला भाग 1927 में प्रकाशित हुआ तथा दूसरा भाग 1929 मे प्रकाशित हुआ । बाद में इसे एक ही पुस्तक के रूप में उपलब्ध कराया गया।
गांधी द्वारा स्थापित नवजीवन ट्रस्ट के अनुसार,यह पुस्तक आज भी उनकी सबसे ज़्यादा बिकने वाली कृति है। इसकी दुनियाभर में 1.09 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं । यह अभी तक भारत की 18 भाषाओं सहित, लगभग 50 भाषाओं में अनुवादित की जा चुकी है और हर साल गांधी की आत्मकथा की लगभग 2 लाख प्रतियां बिकती हैं ।
नवजीवन ट्रस्ट के न्यासी और गांधी साहित्य के अध्येता सोहम पटेल के अनुसार-"यह पुस्तक अपनी ईमानदारी के कारण इतनी लोकप्रिय है। इसमें सत्य की झलक मिलती है। गांधी जी ने अपने अंतर्मन तक को पाठकों के सामने रख दिया है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।"
गांधी ने स्वयं भी स्पष्ट किया था कि वे आत्मकथा नहीं, बल्कि‘सत्य के साथ अपने प्रयोगों की कहानी’ लिख रहे हैं।
"जहाँ सहिष्णुता, परोपकार और सत्य होता है, वहाँ मतभेद भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।"
"विनम्रता के बिना की गई सेवा, स्वार्थ और अहंकार ही है।"
"जो कार्य एक बार शुरू किया गया हो, उसे तब तक नहीं छोड़ना चाहिए, जब तक वह नैतिक रूप से गलत सिद्ध न हो जाए।"
"यदि मनुष्य का हृदय शुद्ध हो, तो विपत्ति अपने साथ ऐसे उपाय भी लाती है, जो उससे लड़ने में सहायक होते हैं।"