रोहिणी व्रत जून 2026 में कब है, क्यों खास है और कैसे मिलता है इसका आध्यात्मिक फल, यहां जानें सबकुछ

रोहिणी व्रत जैन धर्म का पवित्र उपवास है, जो 13 जून 2026 को रखा जाएगा। जानिए इसका धार्मिक महत्व, भगवान वासुपूज्य से जुड़ा संबंध, पूजा विधि और इससे मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ। यह व्रत संयम, शांति और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 8 June 2026, 2:14 PM IST

New Delhi: Rohini Vrat जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जिसे हर महीने रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव के दौरान रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जून 2026 में रोहिणी व्रत 13 जून, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन व्रत का विशेष महत्व बताया गया है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसे पूरी आस्था और नियमों के साथ करते हैं।

यह व्रत मुख्य रूप से जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी को समर्पित माना जाता है, जिनकी आराधना इस दिन विशेष रूप से की जाती है।

धार्मिक महत्व क्या है?

रोहिणी व्रत को जैन धर्म में आत्मिक उन्नति और जीवन में सुख-शांति प्रदान करने वाला व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति मिलती है।

यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसे आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति का माध्यम भी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन की बाधाओं को सहने की शक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

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ज्योतिष शास्त्र में महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को अत्यंत शुभ नक्षत्रों में से एक माना गया है। इसी कारण इस दिन किए गए व्रत और पूजन का विशेष फल प्राप्त होने की मान्यता है।

कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करने से मानसिक शांति मिलती है और व्यक्ति की सोच सकारात्मक बनती है। जैन परंपरा में इसे संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक माना गया है।

अनुशासन और सद्कर्मों की प्रेरणा

Lord Vasupujya Swami को समर्पित यह व्रत भक्तों को संयम, अनुशासन और सद्कर्मों की प्रेरणा देता है। मान्यता है कि रोहिणी व्रत व्यक्ति के जीवन में धैर्य और आत्मनियंत्रण को बढ़ाता है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी मानसिक रूप से मजबूत बना रहता है और परिवार में आपसी प्रेम एवं शांति बनी रहती है।

रोहिणी व्रत की पूजा विधि

व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना आवश्यक माना जाता है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा की तैयारी की जाती है।

भगवान वासुपूज्य स्वामी की प्रतिमा या चित्र के सामने चंदन, पुष्प, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इस दौरान श्रद्धालु “ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय नमः” मंत्र का जप करते हैं।

पूजा के दौरान ध्यान और भक्ति भाव को विशेष महत्व दिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार का पालन करते हैं।

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दान-पुण्य और व्रत का समापन

रोहिणी व्रत में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जरूरतमंदों को अन्न या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है।

व्रत का समापन अगले दिन विधि-विधान के साथ किया जाता है। व्रत को केवल उपवास तक सीमित न मानकर इसे आत्मिक जागरूकता और सकारात्मक जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है।

इस प्रकार रोहिणी व्रत न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह जीवन में संयम, शांति और आध्यात्मिक विकास का संदेश भी देता है।

नोट: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। डाइनामाइट न्यूज़ यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है।

Location :  New Delhi

Published :  8 June 2026, 2:14 PM IST