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मां दुर्गा के माथे पर मकड़ी और जाल क्यों (IMG: Pinterest)
कुछ पारंपरिक दुर्गा प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाली सजावट को ‘डाकर साज’ कहा जाता है। इस सजावट में देवी के माथे पर मकड़ी और उसके जाल का चित्रण देखने को मिल सकता है। मान्यता के अनुसार, मकड़ी का जाल महामाया का प्रतीक माना जाता है। महामाया उस दिव्य शक्ति को कहा जाता है, जो अपनी माया से संसार के संचालन और उसकी विविधता से जुड़ी मानी जाती हैं। इस प्रतीक को समझने के लिए मकड़ी के स्वभाव का उदाहरण दिया जाता है। मकड़ी खुद अपना जाल बनाती है और उसी के बीच रहती है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में धन, परिवार, रिश्तों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों का संसार बनाता है। धीरे-धीरे वह इन्हीं बंधनों में उलझ सकता है। धार्मिक व्याख्या में मकड़ी का जाल संसार की इसी जटिलता और मोह-माया का प्रतीक माना जाता है।
मकड़ी और उसके जाल से जुड़ी इस मान्यता में जीवन के लिए एक संदेश भी देखा जाता है। मकड़ी जाल बनाती है, लेकिन उसके जाल की बनावट और उस पर चलने की उसकी क्षमता उसे उससे अलग ढंग से जुड़ने में सक्षम बनाती है। इसी उदाहरण के जरिए मनुष्य को समझाया जाता है कि पैसा, परिवार, रिश्ते और जिम्मेदारियां जीवन का जरूरी हिस्सा हैं, लेकिन इनके मोह में खुद को पूरी तरह खो देना उचित नहीं है। इस प्रतीकात्मक व्याख्या के अनुसार, इंसान को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मोह-माया के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखना चाहिए। हालांकि, मकड़ी और जाल से जुड़ी यह व्याख्या धार्मिक परंपरा और प्रतीकात्मक मान्यता के रूप में समझी जानी चाहिए।
दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, विजयादशमी की दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। इसी विवरण में मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के लिए 20 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक का समय बताया गया है। श्रद्धालु विसर्जन से पहले अपने स्थानीय पंचांग और पूजा समिति की सूचना से मुहूर्त की पुष्टि कर लें। मां दुर्गा की विदाई के समय भक्त उनसे सुख-समृद्धि, शांति और अगले वर्ष फिर आगमन की प्रार्थना करते हैं।
Location : New Delhi
Published : 18 October 2026, 7:24 PM IST