
शिक्षा मंत्री धर्मेद्र प्रधान का इस्तीफा (Img: Dynamite News)
New Delhi: राजनीति में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जो नेताओं के पूरे सफर को नए नजरिए से देखने पर मजबूर कर देते हैं। धर्मेंद्र प्रधान का नाम इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है। जिस पेपर लीक के खिलाफ उन्होंने अपने छात्र जीवन में सड़क पर उतरकर आंदोलन किया था, आज उसी मुद्दे को लेकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।
करीब तीन दशक पहले की एक तस्वीर और आज के घटनाक्रम की तुलना की जा रही है। लोगों का कहना है कि राजनीति में समय का पहिया कभी भी पूरी तरह घूम सकता है।
साल 1997 में ओडिशा में तत्कालीन सरकार के दौरान प्रश्नपत्र लीक का मामला सामने आया था। इस घटना के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने राज्य सचिवालय के सामने बड़ा प्रदर्शन किया था। उस प्रदर्शन का नेतृत्व धर्मेंद्र प्रधान कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया और कई कार्यकर्ता घायल हुए। बताया जाता है कि धर्मेंद्र प्रधान भी उस कार्रवाई में चोटिल हुए थे। उस समय वे छात्र राजनीति का सक्रिय चेहरा थे और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे थे।
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आज वही घटना फिर से इसलिए याद की जा रही है क्योंकि पेपर लीक का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है।
धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू हुआ। बचपन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़े रहे और बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने तालचेर कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद उत्कल विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव भी लड़ा। हालांकि इस चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली और वे तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन इस हार ने उनके राजनीतिक सफर को नहीं रोका। यही वह दौर था जब उन्होंने संगठन में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू की।
छात्र राजनीति में हार मिलने के बावजूद धर्मेंद्र प्रधान ने संगठन में लगातार काम किया। उनकी सक्रियता और संगठन क्षमता के कारण उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां मिलने लगीं। साल 1994 में वे एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव बने। इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। संगठन में काम करते हुए उन्होंने कई राज्यों में पार्टी के विस्तार और चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान उन्हें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में भी अहम स्थान मिला।
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धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 2000 में पहली बार ओडिशा विधानसभा चुनाव जीतकर सक्रिय चुनावी राजनीति में कदम रखा। इसके बाद 2004 में वे लोकसभा पहुंचे। बाद के वर्षों में वे दो बार राज्यसभा सदस्य भी रहे और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। पेट्रोलियम, कौशल विकास और शिक्षा जैसे अहम विभागों में उन्होंने काम किया। साल 2024 में उन्होंने दो दशक बाद फिर ओडिशा से लोकसभा चुनाव लड़ा और संबलपुर सीट से जीत दर्ज की।
साल 2026 में पेपर लीक को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हुआ। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की मांग को लेकर कई जगह प्रदर्शन हुए। इसी दौरान धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठी। दिलचस्प बात यह रही कि जिस तरह 1997 में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई हुई थी, उसी तरह 2026 में भी छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। इसी वजह से धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक सफर की तुलना उनके छात्र जीवन से की जा रही है।
Location : New Delhi
Published : 25 July 2026, 3:19 PM IST