राम की रावण पर जीत या दुर्गा का महिषासुर वध? जानें विजयदशमी का असली इतिहास
अक्सर लोग दशहरा और विजयदशमी को एक ही मानते हैं, लेकिन दोनों पर्वों की पौराणिक कथाओं में बड़ा अंतर है। इस लेख में जानें मां दुर्गा द्वारा महिषासुर वध, श्रीराम-रावण युद्ध और पांडवों की विजय से जुड़े रोचक और ऐतिहासिक तथ्य।
अक्सर हम यही मानते हैं कि दशहरा सिर्फ भगवान राम की रावण पर जीत की खुशी में मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे कई और पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व 'दशहरा' और 'विजयदशमी' दोनों नामों से जाना जाता है, हालांकि इनके अर्थ और प्रसंग अलग-अलग हैं। आइए इस पर्व से जुड़ी पांच प्रमुख बातों और कथाओं को सरल भाषा में समझते हैं- (सोर्स- Pinterest)
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर ने देवताओं को हराकर तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था। तब सभी देवताओं के तेज से माता दुर्गा (महाशक्ति) प्रकट हुईं। देवी ने महिषासुर के साथ लगातार नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इसी जीत की याद में इस दिन को विजयदशमी कहा जाता है, जहां महिषासुर को एक 'असुर' माना गया है।(सोर्स- Pinterest)
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त्रेतायुग में लंका के राजा रावण ने माता सीता का छलपूर्वक अपहरण कर लिया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई की। श्रीराम और रावण के बीच हुए लंबे युद्ध के बाद, भगवान राम ने दशमी तिथि को रावण का वध किया था। रावण को एक 'राक्षस' माना गया है। असत्य पर सत्य की इस जीत की खुशी में आज भी देश के कई हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं और इसे दशहरा कहा जाता है।(सोर्स- Pinterest)
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एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार, विजयदशमी के दिन ही पांडवों ने कौरवों पर अपनी विजय हासिल की थी। अज्ञातवास पूरा होने के बाद पांडवों ने शमी के पेड़ पर छिपाए अपने हथियार वापस निकाले और कौरव सेना को परास्त किया। इसी मान्यता के चलते देश के कई हिस्सों में आज भी दशहरे के पावन अवसर पर शमी के वृक्ष की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
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कथा है कि अयोध्या के प्रतापी राजा रघु ने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी। जब कौत्स नामक ऋषि ने उनसे गुरुदक्षिणा के लिए स्वर्ण मुद्राएं मांगीं, तो राजा ने धन के देवता कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाई। इससे घबराकर कुबेर ने शमी और अश्मंतक के पेड़ों पर सोने की मुद्राओं की बारिश कर दी। राजा रघु ने वह धन ऋषि को दे दिया और बाकी प्रजा में बांट दिया। इसी कथा के कारण आज भी दशहरे पर लोग एक-दूसरे को शमी के पत्ते 'सोने' के प्रतीक के रूप में देकर शुभकामनाएं देते हैं। डिस्लेमर: इस आलेख में दी गई समस्त जानकारियां और पौराणिक कथाएं विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और ग्रंथों पर आधारित हैं। डाइनामाइट न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है। (सोर्स- Pinterest)
अक्सर हम यही मानते हैं कि दशहरा सिर्फ भगवान राम की रावण पर जीत की खुशी में मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे कई और पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘दशहरा’ और ‘विजयदशमी’ दोनों नामों से जाना जाता है, हालांकि इनके अर्थ और प्रसंग अलग-अलग हैं। आइए इस पर्व से जुड़ी पांच प्रमुख बातों और कथाओं को सरल भाषा में समझते हैं- (सोर्स- Pinterest)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर ने देवताओं को हराकर तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था। तब सभी देवताओं के तेज से माता दुर्गा (महाशक्ति) प्रकट हुईं। देवी ने महिषासुर के साथ लगातार नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इसी जीत की याद में इस दिन को विजयदशमी कहा जाता है, जहां महिषासुर को एक ‘असुर’ माना गया है।(सोर्स- Pinterest)
त्रेतायुग में लंका के राजा रावण ने माता सीता का छलपूर्वक अपहरण कर लिया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई की। श्रीराम और रावण के बीच हुए लंबे युद्ध के बाद, भगवान राम ने दशमी तिथि को रावण का वध किया था। रावण को एक ‘राक्षस’ माना गया है। असत्य पर सत्य की इस जीत की खुशी में आज भी देश के कई हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं और इसे दशहरा कहा जाता है।(सोर्स- Pinterest)
एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार, विजयदशमी के दिन ही पांडवों ने कौरवों पर अपनी विजय हासिल की थी। अज्ञातवास पूरा होने के बाद पांडवों ने शमी के पेड़ पर छिपाए अपने हथियार वापस निकाले और कौरव सेना को परास्त किया। इसी मान्यता के चलते देश के कई हिस्सों में आज भी दशहरे के पावन अवसर पर शमी के वृक्ष की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
कथा है कि अयोध्या के प्रतापी राजा रघु ने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी। जब कौत्स नामक ऋषि ने उनसे गुरुदक्षिणा के लिए स्वर्ण मुद्राएं मांगीं, तो राजा ने धन के देवता कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाई। इससे घबराकर कुबेर ने शमी और अश्मंतक के पेड़ों पर सोने की मुद्राओं की बारिश कर दी। राजा रघु ने वह धन ऋषि को दे दिया और बाकी प्रजा में बांट दिया। इसी कथा के कारण आज भी दशहरे पर लोग एक-दूसरे को शमी के पत्ते ‘सोने’ के प्रतीक के रूप में देकर शुभकामनाएं देते हैं। डिस्लेमर: इस आलेख में दी गई समस्त जानकारियां और पौराणिक कथाएं विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और ग्रंथों पर आधारित हैं। डाइनामाइट न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है। (सोर्स- Pinterest)